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विचारों की सान पर…

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Bhagat Singh Sukhdev Rajguruआज ‘असली शहीद दिवस’ है – बस हम जानते नहीं हैं।

शहीद शिवराम राजगुरु, शहीद सुखदेव थापर और शहीद सरदार भगत सिंह 23 मार्च 1931 को अपना बलिदान दे कर जा चुके हैं। देश स्वतंत्र भी है, शायद। कम से कम किसी दूसरे देश का गुलाम नहीं है, बाकी तरह की गुलामियत के बारे में नहीं कहता।

भगत सिंह ने जीवन के कुल 23 वर्ष ही पूरे किये। जितना ज्यादा मैं जानता-पढ़ता हूँ उनके बारे में, मेरा आश्चर्य बढ़ता जाता है कि इस छोटी सी उम्र में उनके सोचने-समझने की क्षमता कितनी जागृत और परिपक्व थी। क्या आप जानते हैं उनके विचार और लड़ाई सिर्फ ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ ही नहीं थी; सामाजिक पिछड़ेपन, साम्प्रदायिकता, अकर्मण्यता और विचारों के क्षेत्र में अन्धविश्वास के विरुद्ध भी उनकी लड़ाई थी? शायद आज का युवक ये जानता ही नहीं। और ऐसा क्यों न हो, जब हमारी अपनी ‘स्वतंत्र’ सरकारों ने ही हमारे क्रांतिकारियों के विचारों को, उनकी याद को, महज एक ‘धन्यवाद्’ का रूप दे रखा है जो आज के दिन की तरह समाचार-पत्रों में एक-चौथाई पेज में छपता है, बस।

भगत सिंह के बारे में बात करते हुए एक जगह ‘शहीद भगत सिंह शोध समिति’ के डॉ. जगमोहन सिंह और डॉ. चमन लाल ने लिखा है (पुस्तक: ‘भगतसिंह और उनके साथियों के दस्तावेज’) –

“…आज सबसे बड़ी ज़रूरत इस बात की है कि शहीद भगत सिंह के मूल वैचारिक तत्त्व को जाना व समझा जाये। यह पहचानने की ज़रूरत है कि वे कौन से सिद्धान्त थे, कौन से तरीके थे और कौन से गुण थे, जिससे भगत सिंह आत्म-बलिदान करनेवालों में सबसे ऊँचे स्थान के अधिकारी बने? वे कौन सी परिस्थितियाँ थीं, जिन्होंने भगत सिंह को भारतीय चेतना का ऐसा अन्श बनाया कि एक ओर तमिलनाडु में उन पर कविताएँ लिखी जाती हैं तो दूसरी ओर भोजपुर में होली के गीत में ‘भगत सिंह की याद में अँचरिया भीग जाती है।’ लेकिन ऐतिहासिक दुखान्त यह भी घटता है कि जब वर्तमान की समस्याओं का सामना करने के लिए हम अपने अतीत से उदाहरण खोजते हैं तो अतीत के सारतत्व को नहीं, उसके रूप को अपनाने की कोशिश करते हैं, जैसा कि भगत सिंह व उनके साथियों के साथ सरकारी और कुछ अन्य प्रचार-माध्यमों ने किया है।”

लेखकगण आगे लिखते हैं,

“शहीद भगत सिंह न सिर्फ वीरता, साहस, देशभक्ति, दृढ़ता और आत्मा-बलिदान के गुणों में सर्वोत्तम उदाहरण हैं, जैसा कि आज तक इस देश के लोगो को बताया-समझाया गया है, वरन वे अपने लक्ष्य के प्रति स्पष्टता, वैज्ञानिक-ऐतिहासिक दृष्टिकोण से सामाजिक समस्याओं के विश्लेषण की क्षमता वाले अद्भुत बौद्धिक क्रांतिकारी व्यक्तित्व के प्रतिरूप भी थे, जिसे जाने या अनजाने आज तक लोगो से छिपाया गया है।”

मैं समझता हूँ कि यह सच बात है कि हमारी सरकारों ने भगत सिंह और अन्य साथी क्रांतिकारियों के विचारों की पूर्णता को जन-मानस के सामने लाने का कार्य नहीं किया है। पर क्या ये भी सच नहीं है कि देश के नागरिकों ने, युवा-समाज ने भी अपनी ओर से ईमानदार कोशिश ही नहीं की है जानने की? क्या आज भी हम भगत सिंह का सिर्फ क्रांतिकारी स्वरुप नहीं जानते? और क्या हमने कोशिश की है कि हम भगत सिंह के बौद्धिक और वैचारिक स्वरुप को जान पाएं और उनसे सीखें?

कई बार सुनता हूँ कि किस प्रकार से देश में नेतृत्व का अभाव है, ज्ञान का तो और भी ज्यादा। शिकायत है कि नेता नहीं मिलते। और सिर्फ राजनीति की बात नहीं हो रही यहाँ पे, कार्य-क्षेत्र में तो नेतृत्व-क्षमता के अभाव का रोना लगभग रोज़ ही सुनता हूँ। आप भी शायद मानेंगे। पर फिर पूछने की इच्छा होती है कि क्या हम वास्तव में सीख रहे हैं पुराने नेतृत्व से, विचारों से? वो नेतृत्व और विचार जो सिर्फ समय के हिसाब के पुराने होंगे, पर परिपेक्ष्य, उपयोगिता और प्रासंगिकता के हिसाब से बेहद कारगर हैं आज…

“स्वतंत्रता का पौधा शहीदों के रक्त से फलता है”, भगत सिंह ने लिखा था। शहीद राजगुरु, शहीद सुखदेव और शहीद सरदार भगत सिंह के विचारों व कर्मों से रोपित और रक्त से संचित आज ये पौधा भले ही पेड़ बन गया हो, मीठे फ़लों से बहुत दूर है।

आओ दोस्तों, आज शहीदी दिवस पर ये प्रण लें कि जानना शुरू करेंगे उन सिद्धांतो को, उन विचारों को, जिन्होंने एक 23-वर्षीय युवक भगत को ‘शहीद सरदार भगत सिंह’ बनाया। शायद ये हमारे भी कुछ काम आ जायें…

बीता साल…

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बीता साल कई सालों तक सालता रहेगा… कुछ न कर पाने की टीस हमेशा मन में रहेगी। ये सिर्फ दिल वालो की दिल्ली की सड़कों की बे-दिली ही नहीं, अपने खुद के पुरुष होने की शर्म का अहसास भी दिलाता रहेगा…

मैं उसे कई नामों से जानता हूँ – वो माँ है, बीवी, बेटी, बहन और मित्र भी; हमेशा इन्ही नामों से जानना भी चाहता हूँ। लेकिन 2012 सिर्फ उसे ‘निर्भया’ के नाम से जानेगा, ये त्रासदी हमेशा सच रहेगी।

और सच रहेगा इस त्रासदी के साथ उमड़ा जन-आक्रोश भी… जो कि उम्मीद है इस बार सिर्फ हल्ला बोल के, क्रोध दिखा कर, आंसू बहा के ही शांत नहीं हो जायेगा। वो सिर्फ दूसरों में कमी दिखा कर अपनी तसल्ली नहीं करेगा, और सिर्फ सरकार और तंत्र की नपुंसकता की दुहाई नहीं देगा।

उम्मीद यह है कि इस बार वो युवा असल बदलाव की ओर बढेगा – खुद। वो बदलाव अपने खुद के अन्दर लाएगा, सर्वप्रथम। वो दिन प्रतिदिन स्वयं उस परिवर्तन का अंश बनेगा, जो दूसरों में चाहता है। उस बदलाव की बानगी बनेगा, जो दूसरों से मांगता है…

नया साल शुभ हो, इस उम्मीद के साथ कि हम नए साल में उस युवा की तरह बनेंगे, जिसकी परिकल्पना स्वयं शहीद सरदार भगत सिंह ने कुछ यों की थी …

“16 से 25 वर्ष तक हाड़-चर्म के इस संदूक में विधाता संसार भर के हाहाकारों को समेट कर भर देता है… 
युवावस्था में मनुष्य के लिए दो ही मार्ग हैं – 
वह चढ़ सकता है उन्नति के सर्वोच्च शिखर पर; 
वह गिर सकता है अध:पतन के अँधेरे खन्दक में। 
चाहे तो त्यागी बन सकता है युवक, चाहे तो विलासी; 
वह देवता बन सकता है तो पिशाच भी…”

Written by RRGwrites

January 1, 2013 at 1:00 PM

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