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शर्मिंदगी…या सेल्समैनी?

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शाम को घर आया तो न्यूज़ में चर्चा थी कि ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ने कहा कि जलिआंवाला बाग हत्याकांड ‘ब्रिटिश इतिहास का बेहद शर्मनाक हिस्सा है’. वाह साहब! क्या बात है! आप कुछ तो बेहतर निकले आपकी रानी से, जो अगर मुझे ठीक से याद है तो कहती थीं कि ये (नरसंहार) एक ‘मुश्किल घटना’ थी, और आगे बड़ी ही बेदर्दी से ये भी कह बैठीं की ‘अब इतिहास तो बदला नहीं जा सकता’…

मुझे तो डेविड कैमरून साहब किसी दुकानदार से ज्यादा कुछ नहीं लगे; एक सेल्समेन, जो आज यहाँ अपना माल बेचने आया है और भरसक कोशिश कर रहा है कि कैसे कर के अपनी देश की डूबती-उतराती अर्थव्यवस्था को इस 120 करोड़ जनों के बाज़ार के सहारे पार लगा सके। सो कभी वो वीज़ा नियमों को आसान करता है, कभी अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जाते भारतीय छात्रों को लुभाता है और दबी जबान में ‘हथियारों के सौदों’ की बात भी करता है।

वैसे कुछ बात तो है कि हमारे देश में कोई कुछ भी कहे, करे, और फिर ‘खेद’ प्रकट कर दे। ज़्यादा से ज़्यादा क्या हो जायगा – कुछ लोग हल्ला करेंगे, टीवी पर पूरी शाम कुछ नेता, बुद्धिजीवी, पत्रकार और अन्य ‘गणमान्य’ लोग वाद-विवाद करेंगे, और कुछ अगले दिन समाचार पत्रों में छप जायेगा। और क्या, बस। इसलिए कि देश में कुछ भी कहने की आज़ादी है, और फिर कैमरून तो हमारे मेहमान हैं। क्या हुआ जो वो अपनी महत्वाकांक्षी ‘सेल्स पिच’ में जलिआंवाला बाग के दुर्दांत नरसंहार को आज 94 सालों के बाद कुरेद सकते हैं, शर्मनाक बता सकते हैं। आखिर उनके देश में हमारे सिख भाई और बाकी भारतीय समुदाय के लोग बड़ा वोट बैंक जो हैं। और फिर कौन है इस देश का नेता जो उन्हें किसी कठघरे में खड़ा कर पूछेगा कि मेरे भाई, क्यों नहीं शर्मिंदा हो के याद करते कि क्या बढ़िया आव-भगत की थी तुम्हारी जनता ने डायर की? ‘सेवियर ऑफ़ पंजाब’ के खिताब से नवाज़ा, 26000 पौंड दिए और उसके इस दुस्साहस को, बर्बरता को ‘न्यायोचित’ तक कहा? अब वो तो थोड़ा मुश्किल हो जायेगा; नहीं? सेल्समेन थोड़े ही अपने माल की पूरी असलियत बयान करते हैं।

Ben Jennings 20.03.2013इस एक बयान से इस सेल्समेन ने आधुनिक ब्रिटेन को अपने काले साम्राज्यवादी इतिहास से अलग कर लेने की जो कोशिश की, वो खुद में शर्मनाक है। इसलिए नहीं की जो कहा वो गलत है, पर इसलिए की जिस मतलबीपने से, जिस लोभ से कहा, वो ज़रूर निन्दंनीय है। आप खुद ही देखिये कि ब्रिटेन के गार्जियन समाचार पत्र ने क्या बढ़िया कटोरा पकड़ाया अपने प्रधानमंत्री रूपी सेल्समेन को, इस शोचनीय कोशिश के बाद!

अभी तक सुना नहीं की मनमोहन साहब ने क्या कहा इस बारे में। बहुत संभव है की कुछ भी ना बोला हो, और आगे भी न बोलें; वो वैसे भी चुप रहने में ही यकीन रखते हैं!

एक बात और। टीवी पे कुछ लोगो को बोलते सुना कि कैमरून ने क्यों नहीं भगत सिंह की फांसी पर भी शर्मिंदगी जतायी। मन हुआ कि कहूँ, अरे मूर्ख, उस शहीद को तो हमारी ही सरकारों ने याद नहीं किया तो कैमरून तो फिर भी पराये हैं। नहीं तो क्यों आज भी भगत सिंह की 404 पन्नो की जेल में लिखित डायरी आज आम आदमी से दूर, दिल्ली के नेहरु म्यूजियम में सुरक्षित, या कि कहूँ दफ़्न, न होती।

अपने अंतिम दिनों में इस शहीद ने कहा था, ‘भावना कभी नहीं मरती’. मैं समझता हूँ कि आज डेविड कैमरून ने इसी भावना के ज़ख्मों को फिर से जाग्रत करने का शर्मनाक दुस्साहस किया है…

आप क्या सोचते हैं, बताईयेगा?

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Photo-credit: Guardian.co.uk

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