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थोड़ी सी करुणा, बहुत सारा सुक़ून…

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RRGwritesपहली कहानी: कुछ दिन पहले मैं दफ्तर से निकल कर कनॉट-प्लेस के ट्रैफिक-सिग्नल पर रुका हुआ था। शाम का वक़्त था और हमेशा की तरह बेहद भीड़ थी। मेरा दिन भी कुछ थका देने वाला था; भूख भी लगी थी। मैंने बैग में देखा, दो केले रखे हुए थे। बीवी को मन-ही-मन धन्यवाद देते हुए मैंने शुरुआत की। कुछ यूं ही अचानक बाएं तरफ के फुटपाथ पर नज़र पड़ी – एक छोटा सा बच्चा खड़ा हुआ था – उन मे से एक जिन्हे माँ-बाप सिर्फ आमदनी के ज़रिये बनाकर पैदा करते हैं। वो मुझे ही नज़रें बांधें देख रहा था…

मैंने उसे इशारा करके पास बुलाया, जीप का शीशा नीचे कर के एक केला उसे देने को हाथ बढ़ाया… वो अपनी जगह से हिला भी नहीं। मैंने मुस्कुरा के आवाज़ दी, “ले ले यार.…”… वो बेहद धीमी गति से पास आया, और सहमते हुए मेरे हाथ से केला ले लिया। एक पल उसने मुझे ग़ौर से देखा, और फिर एक बेहद मार्मिक, सरल मुस्कराहट मेरी तरफ उछाल दी… और उस फ़ल को अपने छोटे से सीने से लगा के दौड़ पड़ा, शायद अपने दोस्तों को दिखाने…

मैं आपको बताऊँ, बड़े समय के बाद इस करोड़ों लोगों के महानगर में इतनी निश्छल, निःस्वार्थ व बाल-सुलभ मुस्कान देखी। दिन बन गया! उसके बाद अगले डेढ़-घंटे का ट्रैफिक से भरा दिल्ली-से-गुड़गाँव का सफर, जिसे रोज़ाना मैं झींकते-खीज़ते पूरा किया करता हूँ, उसी पूरे रास्ते उस रोज़ मेरे चेहरे पर एक मुस्कराहट रही, शायद उस बच्चे की ख़ुशी के प्रतीक के रूप में…

दूसरी कहानी: दिल्ली-गुड़गाँव में इस बार झुलसा देने वाली धूप और गर्मी है। तक़रीबन दो हफ़्ते पहले ऐसे ही एक तपते रविवार को घर बैठे मैंने अखबार में पढ़ा – गुड़गाँव शहर की इस गर्मी में तक़रीबन तीन-चार सौ तोते और सात-आठ सौ कबूतर गरमी से आहत हो कर दम तोड़ चुकें हैं। लिखने वाले ने कम होते पेड़ों, बढ़ती बहुमंज़िला इमारतों और पक्षियों के लिए घटते दाने-पानी और छाँव का ज़िक्र किया, और जनता से गुज़ारिश की कि अग़र संभव हो, तो मिट्टी के बर्तन में पानी घर के बाहर रखें। शायद कुछ पक्षी बच जाएं…

खबर पढ़ के मन ख़राब हो गया। मेरे घर में एक बड़ा सा बागीचा है। नीम के एक बड़े से पेड़ की छाँव तले मैंने अनेक पेड़-पौधे लगा रखे हैं। सैकड़ों की संख्या में पक्षी आते हैं; उनके दाने और पानी के अलग-अलग बर्तन रखें हैं, जिनमें रोज़ सुबह-शाम खाने की मचती होड़ आप देख सकते हैं इन पक्षियों के बीच। कबूतर, तोते, लुप्त-होती गौरैया, मैना, बुलबुल… और भी ऐसे पक्षी जिनके नाम मैं नहीं जानता, इस बागीचे में, खेलती-कूदती गिलहरियों के बीच, कलरव किया करते हैं। एक मज़ेदार, सुकूनदायक चहल-पहल रहती है। इस दाने-पानी का ध्यान मैं खुद ही रखता हूँ, बाकी घर-भर को भी हिदायत है कि कमी न होने पाये।

यही सोचते हुए अखबार रख कर मैं बाहर आया – भीषण धूप थी और एक भी पक्षी या गिलहरी दिखाई नहीं दे रही थी। पानी के बर्तन पर नज़र गयी, मैं थोड़ी देर उसे देखता रहा… कुछ छोटा सा लगा उस दिन मुझे वो; ख्याल आया, इस बर्तन को तो वही पक्षी देख पाते होंगे जो जानते होंगे कि पेड़ों के मध्य उसका स्थान कहाँ है… पानी ठंडा रहे, इसलिए मैंने ही उस उसे दो बड़े पौधों में बीच रख दिया था। अहसास हुआ कि फिर उन पक्षियों को जो इस चिलचिलाती गरमी में पानी ढूँढ़ते उड़ रहे होंगे… उन्हें तो यह बर्तन दिखायी नहीं देता होगा…

RRGwritesसोचते-सोचते एक विचार आया; गाड़ी निकाली और पुराने गुड़गाँव के कुम्हारों के पास जा कर, एक बड़ा सा मिट्टी का तसला ले आया। कुल-जमा सौ रुपयों का ये बर्तन इतना बड़ा और चौड़े-मुँह वाला था कि दूर गगन से साफ़ दिख जाता। पानी भरा, और उसे बीचों-बीच बगीचे में रख दिया।

आप देख सकते हैं, कैसे अब ये सिर्फ पानी पीने के ही नहीं, चिड़ियों के नहाने-भीगने के भी इस्तेमाल में आता है – मानों चिड़ियों का स्विमिंग-पूल! अब हमारे यहाँ दो पानी के बर्तन हैं, और दोनों में ही पानी पीने वाले पक्षियों की संख्याँ बढ़ गयी है। कुछ नए पक्षी भी आने लगे हैं…

और मैं, और भी खुश हूँ…

यकीन मानिये जनाब, आप को भी इन चिड़ियों का हड़-बोंग पसंद आएगा, एक अजीब सा सुकून तारी होगा…

नहीं मानते? आईये हमारे यहाँ…एक चाय आप और हम पीते हैं इस शोर और इन अठखेलियों के बीच, आप भी मान जायेंगे 🙂

कैसे होता हैं ना; हमारी दौड़ती-भागती, उलझती ज़िन्दगी कैसे कितनी छोटी-छोटी खुशियों को ढूंढ कर हमारे सामने ले आती है; बस शायद  ज़रूरत है तो थोड़ी सी करुणा की…

इन दोनों कहानियों को पढ़ कर अगर आपके चेहरे पर भी मुस्कराहट आयी हो, तो मुझे ज़रूर बताइएगा।

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Image-1 Credit: gettyimages.in

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