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शहीदों के विचार…

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bhagat_singh_1929_140x190आज शहीद सरदार भगत सिंह का 110वां जन्मदिवस है – एक तरीक़े से, आज शहीद उत्सव है।

मैं आपसे शहीद भगत सिंह का उनके अंतिम समय का एक कथन
बाँटना चाहता हूँ; ना जाने क्यों आज मुझे यह बहुत याद आ रहा है –

“ऊषा काल के दीपक की लौ की भांति बुझा चाहता हूँ। इससे क्या हानि है जो ये मुट्ठी भर राख विनष्ट की जाती है। मेरे विचार विद्युत की भांति आलोकित होते रहेंगे…”

कितना गंभीर और निश्छल, परन्तु सत्य वचन है; और इतिहास इस बात का साक्षी है कि उनके विचार आज भी हमें आलोकित करते है…

आईये, आज सोचें कि क्या हमारे आचरण में, विचारों में इतना तेज है कि वो हमारे जाने के बाद भी याद किये जायेंगे और लोग उनका अनुसरण करेंगे?

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Written by RRGwrites

September 27, 2016 at 11:01 AM

विचारों की सान पर…

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आज ‘असली शहीद दिवस’ है – बस हम जानते नहीं हैं।

शहीद शिवराम राजगुरु, शहीद सुखदेव थापर और शहीद सरदार भगत सिंह 23 मार्च 1931 को अपना बलिदान दे कर जा चुके हैं। देश स्वतंत्र भी है, शायद। कम से कम किसी दूसरे देश का गुलाम नहीं है, बाकी तरह की गुलामियत के बारे में नहीं कहता।

भगत सिंह ने जीवन के कुल 23 वर्ष ही पूरे किये। जितना ज्यादा मैं जानता-पढ़ता हूँ उनके बारे में, मेरा आश्चर्य बढ़ता जाता है कि इस छोटी सी उम्र में उनके सोचने-समझने की क्षमता कितनी जागृत और परिपक्व थी। क्या आप जानते हैं उनके विचार और लड़ाई सिर्फ ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ ही नहीं थी; सामाजिक पिछड़ेपन, साम्प्रदायिकता, अकर्मण्यता और विचारों के क्षेत्र में अन्धविश्वास के विरुद्ध भी उनकी लड़ाई थी? शायद आज का युवक ये जानता ही नहीं। और ऐसा क्यों न हो, जब हमारी अपनी ‘स्वतंत्र’ सरकारों ने ही हमारे क्रांतिकारियों के विचारों को, उनकी याद को, महज एक ‘धन्यवाद्’ का रूप दे रखा है जो आज के दिन की तरह समाचार-पत्रों में एक-चौथाई पेज में छपता है, बस।

भगत सिंह के बारे में बात करते हुए एक जगह ‘शहीद भगत सिंह शोध समिति’ के डॉ. जगमोहन सिंह और डॉ. चमन लाल ने लिखा है (पुस्तक: ‘भगतसिंह और उनके साथियों के दस्तावेज’) –

“…आज सबसे बड़ी ज़रूरत इस बात की है कि शहीद भगत सिंह के मूल वैचारिक तत्त्व को जाना व समझा जाये। यह पहचानने की ज़रूरत है कि वे कौन से सिद्धान्त थे, कौन से तरीके थे और कौन से गुण थे, जिससे भगत सिंह आत्म-बलिदान करनेवालों में सबसे ऊँचे स्थान के अधिकारी बने? वे कौन सी परिस्थितियाँ थीं, जिन्होंने भगत सिंह को भारतीय चेतना का ऐसा अन्श बनाया कि एक ओर तमिलनाडु में उन पर कविताएँ लिखी जाती हैं तो दूसरी ओर भोजपुर में होली के गीत में ‘भगत सिंह की याद में अँचरिया भीग जाती है।’ लेकिन ऐतिहासिक दुखान्त यह भी घटता है कि जब वर्तमान की समस्याओं का सामना करने के लिए हम अपने अतीत से उदाहरण खोजते हैं तो अतीत के सारतत्व को नहीं, उसके रूप को अपनाने की कोशिश करते हैं, जैसा कि भगत सिंह व उनके साथियों के साथ सरकारी और कुछ अन्य प्रचार-माध्यमों ने किया है।”

लेखकगण आगे लिखते हैं,

“शहीद भगत सिंह न सिर्फ वीरता, साहस, देशभक्ति, दृढ़ता और आत्मा-बलिदान के गुणों में सर्वोत्तम उदाहरण हैं, जैसा कि आज तक इस देश के लोगो को बताया-समझाया गया है, वरन वे अपने लक्ष्य के प्रति स्पष्टता, वैज्ञानिक-ऐतिहासिक दृष्टिकोण से सामाजिक समस्याओं के विश्लेषण की क्षमता वाले अद्भुत बौद्धिक क्रांतिकारी व्यक्तित्व के प्रतिरूप भी थे, जिसे जाने या अनजाने आज तक लोगो से छिपाया गया है।”

मैं समझता हूँ कि यह सच बात है कि हमारी सरकारों ने भगत सिंह और अन्य साथी क्रांतिकारियों के विचारों की पूर्णता को जन-मानस के सामने लाने का कार्य नहीं किया है। पर क्या ये भी सच नहीं है कि देश के नागरिकों ने, युवा-समाज ने भी अपनी ओर से ईमानदार कोशिश ही नहीं की है जानने की? क्या आज भी हम भगत सिंह का सिर्फ क्रांतिकारी स्वरुप नहीं जानते? और क्या हमने कोशिश की है कि हम भगत सिंह के बौद्धिक और वैचारिक स्वरुप को जान पाएं और उनसे सीखें?

कई बार सुनता हूँ कि किस प्रकार से देश में नेतृत्व का अभाव है, ज्ञान का तो और भी ज्यादा। शिकायत है कि नेता नहीं मिलते। और सिर्फ राजनीति की बात नहीं हो रही यहाँ पे, कार्य-क्षेत्र में तो नेतृत्व-क्षमता के अभाव का रोना लगभग रोज़ ही सुनता हूँ। आप भी शायद मानेंगे। पर फिर पूछने की इच्छा होती है कि क्या हम वास्तव में सीख रहे हैं पुराने नेतृत्व से, विचारों से? वो नेतृत्व और विचार जो सिर्फ समय के हिसाब के पुराने होंगे, पर परिपेक्ष्य, उपयोगिता और प्रासंगिकता के हिसाब से बेहद कारगर हैं आज…

“स्वतंत्रता का पौधा शहीदों के रक्त से फलता है”, भगत सिंह ने लिखा था। शहीद राजगुरु, शहीद सुखदेव और शहीद सरदार भगत सिंह के विचारों व कर्मों से रोपित और रक्त से संचित आज ये पौधा भले ही पेड़ बन गया हो, मीठे फ़लों से बहुत दूर है।

आओ दोस्तों, आज शहीदी दिवस पर ये प्रण लें कि जानना शुरू करेंगे उन सिद्धांतो को, उन विचारों को, जिन्होंने एक 23-वर्षीय युवक भगत को ‘शहीद सरदार भगत सिंह’ बनाया। शायद ये हमारे भी कुछ काम आ जायें…

Written by RRGwrites

March 23, 2016 at 1:34 PM

YUVA – For The Young India…

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Written by RRGwrites

January 11, 2016 at 11:51 AM

How I Remember Nelson Mandela…

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imagesAnother day of unease passed by today in South Africa. Nelson Mandela, greatest hero of the nation, is tragically unwell. Prayers are being offered, not only in South Africa, but also all over the world. He is a true hero in many senses…

Today, I am reminded of a day of year 1988, 25 years ago. Studying in the 3rd standard, I was growing up learning about Shaheed Sardar Bhagat Singh, who, to date is my role model. On that day, I remember asking Ms. Chowdhary, my school teacher, “Miss, is there any other person in this world who is just like our own valiant Bhagat Singh?”

Bhagat Singh“Yes, there is, my son. His name is Nelson Mandela”, she replied. That was the first time I heard his name.

Now that Nelson Mandela is probably living his last days, I am reminded of this conversation quite vividly. I remember Ms. Chowdhary, a superb teacher, sharing some stories about him with me. They stayed with me, and probably, left a lasting impression on my formative years. I went on to read and learn a lot more about Nelson Mandela, his life, his values & believes, his leadership & bravery, clarity of thought & purpose and above all, the strength of his character. And really, he appeared to me a man very similar to Bhagat Singh.

Seven sentences of his that I am quoting below will tell you what a man he was and why I can surely call him ‘Bhagat Singh of South Africa’:

  • I was called a terrorist yesterday, but when I came out of jail, many people embraced me, including my enemies, and that is what I normally tell other people who say those who are struggling for liberation in their country are terrorists.
  • Nonviolence is a good policy when the conditions permit.
  • Education is the most powerful weapon, which you can use to change the world.
  • For to be free is not merely to cast off one’s chains, but to live in a way that respects and enhances the freedom of others.
  • I do not deny that I planned sabotage. I did not plan it in a spirit of recklessness nor because I have any love of violence. I planned it as a result of a calm and sober assessment of the political situation that had arisen after many years of tyranny, exploitation and oppression of my people…
  • Any man or institution that tries to rob me of my dignity will lose.
  • Our single most important challenge is… to help establish a social order in which the freedom of the individual will truly mean the freedom of the individual.

They say, Mandela admired Mahatma Gandhi. Something in me tells, he would have admired Bhagat Singh as well. After all, he was more like him than Gandhi…

I am praying for him…

_____________________________________________

Photo-credit 1: guardiantv.com

Photo-credit 2: hindustantimes.com

Written by RRGwrites

June 27, 2013 at 9:08 PM

विचारों की सान पर…

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Bhagat Singh Sukhdev Rajguruआज ‘असली शहीद दिवस’ है – बस हम जानते नहीं हैं।

शहीद शिवराम राजगुरु, शहीद सुखदेव थापर और शहीद सरदार भगत सिंह 23 मार्च 1931 को अपना बलिदान दे कर जा चुके हैं। देश स्वतंत्र भी है, शायद। कम से कम किसी दूसरे देश का गुलाम नहीं है, बाकी तरह की गुलामियत के बारे में नहीं कहता।

भगत सिंह ने जीवन के कुल 23 वर्ष ही पूरे किये। जितना ज्यादा मैं जानता-पढ़ता हूँ उनके बारे में, मेरा आश्चर्य बढ़ता जाता है कि इस छोटी सी उम्र में उनके सोचने-समझने की क्षमता कितनी जागृत और परिपक्व थी। क्या आप जानते हैं उनके विचार और लड़ाई सिर्फ ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ ही नहीं थी; सामाजिक पिछड़ेपन, साम्प्रदायिकता, अकर्मण्यता और विचारों के क्षेत्र में अन्धविश्वास के विरुद्ध भी उनकी लड़ाई थी? शायद आज का युवक ये जानता ही नहीं। और ऐसा क्यों न हो, जब हमारी अपनी ‘स्वतंत्र’ सरकारों ने ही हमारे क्रांतिकारियों के विचारों को, उनकी याद को, महज एक ‘धन्यवाद्’ का रूप दे रखा है जो आज के दिन की तरह समाचार-पत्रों में एक-चौथाई पेज में छपता है, बस।

भगत सिंह के बारे में बात करते हुए एक जगह ‘शहीद भगत सिंह शोध समिति’ के डॉ. जगमोहन सिंह और डॉ. चमन लाल ने लिखा है (पुस्तक: ‘भगतसिंह और उनके साथियों के दस्तावेज’) –

“…आज सबसे बड़ी ज़रूरत इस बात की है कि शहीद भगत सिंह के मूल वैचारिक तत्त्व को जाना व समझा जाये। यह पहचानने की ज़रूरत है कि वे कौन से सिद्धान्त थे, कौन से तरीके थे और कौन से गुण थे, जिससे भगत सिंह आत्म-बलिदान करनेवालों में सबसे ऊँचे स्थान के अधिकारी बने? वे कौन सी परिस्थितियाँ थीं, जिन्होंने भगत सिंह को भारतीय चेतना का ऐसा अन्श बनाया कि एक ओर तमिलनाडु में उन पर कविताएँ लिखी जाती हैं तो दूसरी ओर भोजपुर में होली के गीत में ‘भगत सिंह की याद में अँचरिया भीग जाती है।’ लेकिन ऐतिहासिक दुखान्त यह भी घटता है कि जब वर्तमान की समस्याओं का सामना करने के लिए हम अपने अतीत से उदाहरण खोजते हैं तो अतीत के सारतत्व को नहीं, उसके रूप को अपनाने की कोशिश करते हैं, जैसा कि भगत सिंह व उनके साथियों के साथ सरकारी और कुछ अन्य प्रचार-माध्यमों ने किया है।”

लेखकगण आगे लिखते हैं,

“शहीद भगत सिंह न सिर्फ वीरता, साहस, देशभक्ति, दृढ़ता और आत्मा-बलिदान के गुणों में सर्वोत्तम उदाहरण हैं, जैसा कि आज तक इस देश के लोगो को बताया-समझाया गया है, वरन वे अपने लक्ष्य के प्रति स्पष्टता, वैज्ञानिक-ऐतिहासिक दृष्टिकोण से सामाजिक समस्याओं के विश्लेषण की क्षमता वाले अद्भुत बौद्धिक क्रांतिकारी व्यक्तित्व के प्रतिरूप भी थे, जिसे जाने या अनजाने आज तक लोगो से छिपाया गया है।”

मैं समझता हूँ कि यह सच बात है कि हमारी सरकारों ने भगत सिंह और अन्य साथी क्रांतिकारियों के विचारों की पूर्णता को जन-मानस के सामने लाने का कार्य नहीं किया है। पर क्या ये भी सच नहीं है कि देश के नागरिकों ने, युवा-समाज ने भी अपनी ओर से ईमानदार कोशिश ही नहीं की है जानने की? क्या आज भी हम भगत सिंह का सिर्फ क्रांतिकारी स्वरुप नहीं जानते? और क्या हमने कोशिश की है कि हम भगत सिंह के बौद्धिक और वैचारिक स्वरुप को जान पाएं और उनसे सीखें?

कई बार सुनता हूँ कि किस प्रकार से देश में नेतृत्व का अभाव है, ज्ञान का तो और भी ज्यादा। शिकायत है कि नेता नहीं मिलते। और सिर्फ राजनीति की बात नहीं हो रही यहाँ पे, कार्य-क्षेत्र में तो नेतृत्व-क्षमता के अभाव का रोना लगभग रोज़ ही सुनता हूँ। आप भी शायद मानेंगे। पर फिर पूछने की इच्छा होती है कि क्या हम वास्तव में सीख रहे हैं पुराने नेतृत्व से, विचारों से? वो नेतृत्व और विचार जो सिर्फ समय के हिसाब के पुराने होंगे, पर परिपेक्ष्य, उपयोगिता और प्रासंगिकता के हिसाब से बेहद कारगर हैं आज…

“स्वतंत्रता का पौधा शहीदों के रक्त से फलता है”, भगत सिंह ने लिखा था। शहीद राजगुरु, शहीद सुखदेव और शहीद सरदार भगत सिंह के विचारों व कर्मों से रोपित और रक्त से संचित आज ये पौधा भले ही पेड़ बन गया हो, मीठे फ़लों से बहुत दूर है।

आओ दोस्तों, आज शहीदी दिवस पर ये प्रण लें कि जानना शुरू करेंगे उन सिद्धांतो को, उन विचारों को, जिन्होंने एक 23-वर्षीय युवक भगत को ‘शहीद सरदार भगत सिंह’ बनाया। शायद ये हमारे भी कुछ काम आ जायें…

शर्मिंदगी…या सेल्समैनी?

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शाम को घर आया तो न्यूज़ में चर्चा थी कि ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ने कहा कि जलिआंवाला बाग हत्याकांड ‘ब्रिटिश इतिहास का बेहद शर्मनाक हिस्सा है’. वाह साहब! क्या बात है! आप कुछ तो बेहतर निकले आपकी रानी से, जो अगर मुझे ठीक से याद है तो कहती थीं कि ये (नरसंहार) एक ‘मुश्किल घटना’ थी, और आगे बड़ी ही बेदर्दी से ये भी कह बैठीं की ‘अब इतिहास तो बदला नहीं जा सकता’…

मुझे तो डेविड कैमरून साहब किसी दुकानदार से ज्यादा कुछ नहीं लगे; एक सेल्समेन, जो आज यहाँ अपना माल बेचने आया है और भरसक कोशिश कर रहा है कि कैसे कर के अपनी देश की डूबती-उतराती अर्थव्यवस्था को इस 120 करोड़ जनों के बाज़ार के सहारे पार लगा सके। सो कभी वो वीज़ा नियमों को आसान करता है, कभी अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जाते भारतीय छात्रों को लुभाता है और दबी जबान में ‘हथियारों के सौदों’ की बात भी करता है।

वैसे कुछ बात तो है कि हमारे देश में कोई कुछ भी कहे, करे, और फिर ‘खेद’ प्रकट कर दे। ज़्यादा से ज़्यादा क्या हो जायगा – कुछ लोग हल्ला करेंगे, टीवी पर पूरी शाम कुछ नेता, बुद्धिजीवी, पत्रकार और अन्य ‘गणमान्य’ लोग वाद-विवाद करेंगे, और कुछ अगले दिन समाचार पत्रों में छप जायेगा। और क्या, बस। इसलिए कि देश में कुछ भी कहने की आज़ादी है, और फिर कैमरून तो हमारे मेहमान हैं। क्या हुआ जो वो अपनी महत्वाकांक्षी ‘सेल्स पिच’ में जलिआंवाला बाग के दुर्दांत नरसंहार को आज 94 सालों के बाद कुरेद सकते हैं, शर्मनाक बता सकते हैं। आखिर उनके देश में हमारे सिख भाई और बाकी भारतीय समुदाय के लोग बड़ा वोट बैंक जो हैं। और फिर कौन है इस देश का नेता जो उन्हें किसी कठघरे में खड़ा कर पूछेगा कि मेरे भाई, क्यों नहीं शर्मिंदा हो के याद करते कि क्या बढ़िया आव-भगत की थी तुम्हारी जनता ने डायर की? ‘सेवियर ऑफ़ पंजाब’ के खिताब से नवाज़ा, 26000 पौंड दिए और उसके इस दुस्साहस को, बर्बरता को ‘न्यायोचित’ तक कहा? अब वो तो थोड़ा मुश्किल हो जायेगा; नहीं? सेल्समेन थोड़े ही अपने माल की पूरी असलियत बयान करते हैं।

Ben Jennings 20.03.2013इस एक बयान से इस सेल्समेन ने आधुनिक ब्रिटेन को अपने काले साम्राज्यवादी इतिहास से अलग कर लेने की जो कोशिश की, वो खुद में शर्मनाक है। इसलिए नहीं की जो कहा वो गलत है, पर इसलिए की जिस मतलबीपने से, जिस लोभ से कहा, वो ज़रूर निन्दंनीय है। आप खुद ही देखिये कि ब्रिटेन के गार्जियन समाचार पत्र ने क्या बढ़िया कटोरा पकड़ाया अपने प्रधानमंत्री रूपी सेल्समेन को, इस शोचनीय कोशिश के बाद!

अभी तक सुना नहीं की मनमोहन साहब ने क्या कहा इस बारे में। बहुत संभव है की कुछ भी ना बोला हो, और आगे भी न बोलें; वो वैसे भी चुप रहने में ही यकीन रखते हैं!

एक बात और। टीवी पे कुछ लोगो को बोलते सुना कि कैमरून ने क्यों नहीं भगत सिंह की फांसी पर भी शर्मिंदगी जतायी। मन हुआ कि कहूँ, अरे मूर्ख, उस शहीद को तो हमारी ही सरकारों ने याद नहीं किया तो कैमरून तो फिर भी पराये हैं। नहीं तो क्यों आज भी भगत सिंह की 404 पन्नो की जेल में लिखित डायरी आज आम आदमी से दूर, दिल्ली के नेहरु म्यूजियम में सुरक्षित, या कि कहूँ दफ़्न, न होती।

अपने अंतिम दिनों में इस शहीद ने कहा था, ‘भावना कभी नहीं मरती’. मैं समझता हूँ कि आज डेविड कैमरून ने इसी भावना के ज़ख्मों को फिर से जाग्रत करने का शर्मनाक दुस्साहस किया है…

आप क्या सोचते हैं, बताईयेगा?

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Photo-credit: Guardian.co.uk

बीता साल…

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बीता साल कई सालों तक सालता रहेगा… कुछ न कर पाने की टीस हमेशा मन में रहेगी। ये सिर्फ दिल वालो की दिल्ली की सड़कों की बे-दिली ही नहीं, अपने खुद के पुरुष होने की शर्म का अहसास भी दिलाता रहेगा…

मैं उसे कई नामों से जानता हूँ – वो माँ है, बीवी, बेटी, बहन और मित्र भी; हमेशा इन्ही नामों से जानना भी चाहता हूँ। लेकिन 2012 सिर्फ उसे ‘निर्भया’ के नाम से जानेगा, ये त्रासदी हमेशा सच रहेगी।

और सच रहेगा इस त्रासदी के साथ उमड़ा जन-आक्रोश भी… जो कि उम्मीद है इस बार सिर्फ हल्ला बोल के, क्रोध दिखा कर, आंसू बहा के ही शांत नहीं हो जायेगा। वो सिर्फ दूसरों में कमी दिखा कर अपनी तसल्ली नहीं करेगा, और सिर्फ सरकार और तंत्र की नपुंसकता की दुहाई नहीं देगा।

उम्मीद यह है कि इस बार वो युवा असल बदलाव की ओर बढेगा – खुद। वो बदलाव अपने खुद के अन्दर लाएगा, सर्वप्रथम। वो दिन प्रतिदिन स्वयं उस परिवर्तन का अंश बनेगा, जो दूसरों में चाहता है। उस बदलाव की बानगी बनेगा, जो दूसरों से मांगता है…

नया साल शुभ हो, इस उम्मीद के साथ कि हम नए साल में उस युवा की तरह बनेंगे, जिसकी परिकल्पना स्वयं शहीद सरदार भगत सिंह ने कुछ यों की थी …

“16 से 25 वर्ष तक हाड़-चर्म के इस संदूक में विधाता संसार भर के हाहाकारों को समेट कर भर देता है… 
युवावस्था में मनुष्य के लिए दो ही मार्ग हैं – 
वह चढ़ सकता है उन्नति के सर्वोच्च शिखर पर; 
वह गिर सकता है अध:पतन के अँधेरे खन्दक में। 
चाहे तो त्यागी बन सकता है युवक, चाहे तो विलासी; 
वह देवता बन सकता है तो पिशाच भी…”

Written by RRGwrites

January 1, 2013 at 1:00 PM

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