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स्याही का रंग…

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Ink RRGwritesआजकल मैं बड़ा विचलित हूँ। गाय को ‘माँ’ कहने वाले, एक-दूसरे की माँओं को गाली दे रहे हैं। दूसरी तरफ, मज़हबी हाशिये की तुच्छ राजनीति करने वाले कुछ अहमक़ सियासतदां जानते-बूझते इस जम्हूरियत में छेद करके UN जाना चाह रहे हैं और यह जता रहे हैं कि कैसे इक ख़ास किस्म के गोश्त के टुकड़े की भूख़ पूरे देश के भूखे मरते आवाम से बड़ी है। कहीं तो स्याही का रंग इतना वीभत्स हो चला है कि वो लिखने के लिए नहीं, मुँह काले करने के काम आ रही है, ऐसे कि भगवे रंग के हिमायती भी भगवा छोड़ इस काले रंग के मुरीद हो चले हैं। कौन भारतीय हिंदुस्तान में रहेगा और कौन पाकिस्तान जाये, ये बताने वाले कितने सारे हो गए हैं। दूसरी ओर, स्याही के सिकंदर लिख कर विरोध ना जता कर, सरकारी और गैर-सरकारी पुरस्कार वापस कर के जता रहे हैं। जानवरों की ऱक्षा करने के लिए टीवी चैनलों पर इतनी चिंता बिखरी हुयी है कि दिल्ली महानगर में होते मासूमों के बढ़ते दुराचारों की भयावह चीखें नक्कारखाने में बजती तूतियों के समान प्रतीत होती दीखती हैं।

इतनी नकारात्मकता फैली है… अजब हड़बोंग मचा है चारो ओर.… संस्कृति और धर्म के नाम पर। गाय के नाम पर, सारे-के-सारे बछिया के ताऊ, यानी बैल, हुए जा रहे हैं। सुर्खियां और वोट बटोरने के लिए धर्म का बाजार गर्म है।

हिंदी भाषा के महान लेखक, रामधारी सिंह दिनकर ने एक जगह कहा है:

“संस्कृति ज़िन्दगी का एक तरीका है और ये तरीका सदियों से जमा होकर उस समाज में छाया रहता है, जिसमे हम जन्म लेते हैं।”

मैं शहरे-अवध लखनऊ की गंगा-जमुनी संस्कृति का बाशिंदा हूँ; बचपन से मेरे मित्र सभी धर्मों के थे, आज भी हैं। मिशनरी स्कूल में हिन्दू और मुस्लिम दोनों पढ़ते थे, हम अपने सिख दोस्तों के साथ गुरूद्वारे जाते और जब भी मौका मिले, बंगाली रसगुल्ले नाक डुबो-डुबो कर खाते। जब कभी हम आपसे में लड़ते-भिड़ते, वो मजहबी रंग न लेकर दो छोरो की आपसी लड़ाई मानी जाती थी। होली और ईद, दोनों पर खुश होना हमने सीखा। मंगलवार को हिन्दू दोस्त गोश्त नहीं खाते, इस वजह से हमारे मुस्लिम दोस्त-यार ख़ुशी और पूरे मन से शाकाहारी खाना खा लेते थे, ना कि मज़हबी आज़ादी के नाम पर ‘बीफ पार्टियां’ आयोजित करते। दीवाली पर खील-बताशों के माफ़िक ईद पर सिवईंयां मैं आज भी खोजता-लाता हूँ। मेरे लिए ये ज़िन्दगी जीने का तरीका, मेरी संस्कृति है। हमारे मरहूम वालिद साहब कहा करते थे, “जो धारण करने योग्य है, वही धर्म है।” ये सीख बहुत बचपन से मेरे साथ रही। तब तो, कम-स-कम मेरे बचपन के दिनों में, हिन्दू अगले और मुस्लिम पिछड़े या मुस्लिम आगे और हिन्दू पीछे – ऐसा नहीं होता देखा मैंने।

इस मज़हबी गैर-रवादारी और राजनीतिक असहिषुणता ने सारे देश में एक बेचैन कर देने वाली मानसिकता पैदा कर दी हैं। और वो काफी हद तक हमें बाँटने में सफल होती भी दीखती है!

पर क्यों?

Written by RRGwrites

October 19, 2015 at 7:01 PM

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