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Travel Diary Of A Non-employed Man…

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RRG in Bliss

Well, for those who know me, it is rather difficult for them not be startled as they read the title of this blog 🙂

It is for the very first time in my nine-year long career that I am not working! Well, read it this way – for the very first time in my life, I have taken a long break whilst moving between jobs… and I am really not complaining, for a change, you see…

While the above picture is taken at a virgin beach at Pondicherry, where I am presently stationed, my travel started with driving Guy (my new jeep) to Lucknow. 11 hours straight! I took NH-2, and covered towns of Agra, Etawah and Kanpur to reach Lucknow. And boy, what a ride it was! With rains lashing Guy for most part of the journey, this is how it looked the next morning – the true Jeeper’s Jeep:

Guy at Lucknow

Lucknow was a totally ‘food-festival-holiday’ for me – I just refused to dine at home! Zeeshan ke Shaami, Galauti Kabab aur Boti-Paraathe, Sadar ke Gol-gappe, Naushein-Jahan ki Dum-biryani, Udaigunj ke Salim ki Gosht-biryani, Chowk waale Tiwariji ki Thandai – you name it and I had it! And despite being there for four full days and even with ‘highway on my plate’ style of travel, I still missed a lot – couldn’t eat Idris ki Imli ke Koyle waali Biryani, Ratti ke Khaste, Chaudhary Sweets ki Ras-Malai, Madras Mess ka Masala Dosa… all now parked in the menu now for the next time. Insha Allah!

Lord knows, I am a biker at heart, love riding True – my Royal Enfield Classic. And to me, what Rishad Saam Mehta, a travel writer and Bullet enthusiast, is absolutely right when he calls it “a meditative motorcycle — on a Bullet on the highway, you feel alone and happy…”

And yet, you will have to trust me, driving a Thar comes closest next to it. I was alone, and happy, while driving Guy for all those long hours. Nothing between me and silence… no phone, no email… sheer bliss of belonging to the road! An absolute marvel of a machine, I drove it for 10 hours non-stop on my journey back to Gurgaon! Only to fly off to Pondicherry…

As my wife Neha calls it, I am thoroughly enjoying my ‘currently non-employed’ status to the hilt! Does my grin in the picture above not say that? 🙂

Detailed travelogs will follow on Ghumakkar.com soon. I now sign off and go back to bliss!

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लखनवियत…

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आज नवभारत टाइम्स अखबार में ब्रजेश शुक्ल का लेख पढ़ा – “इस लखनवियत पर पूरी दुनिया कुर्बान” – मज़ा आ गया। और याद आया वो जुमला, जो हमारे वालिद साहब कहा करते थे –

‘लखनऊ की नज़ाकत है, कि रसगुल्ले भी छील के खाए जाते हैं।’

बड़ी ही इच्छा है कि आप लोग भी इस लेख को पढ़ें। इस अंग्रेज़-दां ज़माने में शायद आप में से हिंदी का अखबार घर मँगाने और पढ़ने वाले कम ही होंगे, इसलिए मैं इस लेख को साभार प्रस्तुत कर रहा हूँ –

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इस लखनवियत पर पूरी दुनिया कुर्बान
बृजेश शुक्ल।।

नवभारत टाइम्स | Aug 13, 2013

‘पहले आप! कहने की ताब वही ला पाते हैं जिनमे औरों को खुद से आगे रखने की सभ्यता हो

पुराने लखनऊ में मेरे एक दोस्त रहते हैं। एक दिन अपना घर दिखाने लगे और मुस्कराकर बोले- यहां से वहां तक आपका ही घर है। लखनवी तहजीब, नफासत, नजाकत, इलमी अदब, वजादारी, मेहमानवाजी, हाजिर जवाबी में लखनऊ का दुनिया में कोई जोड़ नहीं। पिछले तीस सालों में लखनऊ कहां से कहां तक तरतीब और बेतरतीब ढंग से बढ़ा, उससे यह सवाल जरूर उठा कि लखनवियत अब बचेगी या नहीं। लेकिन टुकड़ों में ही सही, लखनवियत आज भी जिंदा है। विकास की अंधी दौड़ में समाज का बड़ा वर्ग ‘पहले आप! पहले आप!’ की तहजीब को भी नहीं समझ पाया। कुछ लोगों के लिए यह शब्द मजाक का विषय भी बना। लेकिन यकीन मानिए, ‘पहले आप! पहले आप!’ तो उसी महान संस्कृति के लोग कह सकते हैं, जिसमें कुर्बानी का जज्बा हो, जिसमें मेहमाननवाजी और दूसरों को तरजीह देने की कूवत हो। जो पहले खुद के लिए परेशान है, वह पहले आप बोल ही नहीं सकता।

नवाब आसफुद्दौला

लखनवियत लखनऊ के रस्मोरिवाज में घुली-मिली है। रमजान के दिनों में आप देर रात पुराने लखनऊ की गलियों में घूमिए। चाय की दुकानों में सामने रखे चाय के प्याले की ओर इशारा करते हुए यह कहने वाले आपको बहुत से लोग मिलेंगे- नहीं-नहीं, पहले आप लीजिए। लखनऊ में सन् 1722 में नवाबों का शासन आया और 1857 तक चला। लेकिन लखनवियत पनपी और बढ़ी 1775 से, यानी नवाब आसफुद्दौला के शासनकाल से। नवाब वाजिद अली शाह के समय में तो इस तरह फली-फूली कि लोग इस पर कुर्बान हो गए। वास्तव में लखनवियत तीन बुनियादी मूल्यों पर आधारित है। पहला इंसानियत, दूसरा हक यानी किसी जाति-धर्म का व्यक्ति हो, उसके साथ किसी तरह का भेदभाव न हो। तीसरा बिंदु है धर्मनिरपेक्षता- हर मजहब और मिल्लत की इज्जत करना और उसकी बेहतर चीजों को अपनाना। यहां बहुत से हिंदू एक दिन का रोजा रखते है। मोहर्रम के दिनों में तमाम हिंदू महिलाएं इमामबाड़े व ताजिये के सामने जाकर मन्नतें मांगती हैं। जी हां, आज भी।

जोगिया मेला और इंदरसभा

‘काजमैन रौजा’ लाला जगन्नाथ ने बनवाया था। नवाब आसफुद्दौला के वजीर झाऊलाल ने ठाकुरगंज में इमामबाड़ा और टिकैतराय ने एक मस्जिद बनवाई। अमीनाबाद में पंडिताइन की मस्जिद मशहूर है। अलीगंज के हनुमान मंदिर के शिखर पर चमकने वाला इस्लामी चिन्ह चांद-तारा लखनवियत का प्रतीक है। इस मंदिर की संगेबुनियाद नवाब शुजाउद्दौला की बेगम और नवाब आसफुद्दौला की वालिदा बहूबेगम ने रखी थी। इस आपसी भाईचारे के कारण ही लखनऊ में अमन-चैन रहा। एक बार नवाब आसफुद्दौला का पड़ाव अयोध्या में पड़ा। नवाब साहब को जब तोपों की सलामी दी जा रही थी तभी उनके कानों में घंटा-घड़ियाल की आवाजें पड़ी। नवाब ने हुक्म दिया कि उनका पड़ाव इस पवित्र नगरी से पांच मील दूर डाला जाए, ताकि हिंदुओं को पूजा-पाठ में कोई व्यवधान न पैदा हो। नवाब वाजिद अली शाह हर साल जोगिया मेला लगवाते थे। उन्होंने राधा-कन्हैया और इंदरसभा नाटक लिखे और स्वयं श्रीकृष्ण की भूमिका करते थे।

तबला, खयाल, ठुमरी, सितार की परवरिश लखनऊ में हुई। कथक ने यही जन्म लिया। आदाब लखनवियत का हिस्सा है। जरा नवाबों की सोच तो देखिए। हिंदू नमस्ते कहे, मुसलमान सलाम करे तो एकता के दर्शन कहां। नवाबों ने दोनों वर्गो के लिए आदाब दिया। नजरें और सर थोड़ा झुका हुआ। उंगलियां आगे की ओर झुकी हुईं और हाथ को नीचे से थोड़ा ऊपर ले जाकर धीरे से आदाब कहना। इस लखनवियत में अहंकार नहीं है, संपन्नता का गरूर नहीं है। इस तहजीब की सबसे बड़ी खासियत यही है कि जुबान और व्यवहार से किसी को कष्ट न पहुंचे। कोई बीमार है तो यह नहीं पूछा जायेगा कि सुना आप बीमार है। पूछने वाला यही कह कर बीमार का हाल जान लेगा कि सुना है हुजूर के दुश्मनों की तबीयत नासाज है। लखनवी जुबान उर्दू है। लेकिन बहुत रस में पकी हुई, शहद में डूबी हुई। मुगलिया सल्तनत की जुबान फारसी थी। लेकिन उर्दू दक्षिण में पैदा हुई, दिल्ली में जवान हुई, लखनऊ में दुल्हन बनी और शबाब पाया।

वक्त बदल गया है। दीवारों से लखौरी ईटें गायब हो रही है। इमारतों का आर्किटेक्चर बदल रहा है। लेकिन पुराने लखनऊ की गलियों में आज भी लखनवियत नजर आती है। काजमैन के पास किसी बात को लेकर दो गुटों में तनाव हो गया। पत्रकार पहुंचे तो उन्होंने जानकारी चाही। वहां खड़े एक युवक ने बड़े मीठे लहजे में बताया- जनाब उधर शिया हजरात रहते हैं, इधर अहले सुन्नत हजरात रहते हैं। पत्रकारों ने समझा कि कोई मुस्लिम युवक है, इसी से बात कर ली जाए। नाम पूछा तो पता चला कि वह हिंदू था। लखनऊ की नजाकत, नफासत और मीठी जबान धर्म के आधार पर नहीं बंटी। यह तो एक तहजीब है। लखनऊ की हवाओं में लखनवियत है। गालियों से लेकर मोहब्बत व छेड़खानी तक का अपना अंदाज है। इस तहजीब को जीवन में उतार चुके लोगों की लड़ाइयों का भी तर्जे बयां निराला है- ‘अब आप एक लफ्ज भी न बोलिएगा, बाखुदा आपकी शान में गुस्ताखी कर दूंगा।’ जवाब आएगा- ‘चलो मैं नहीं बोलता अब आप फरमाइए।’

दुनिया में लाजवाब है तू

अब जीवन तेज गति से चल रहा है। किसी के पास समय नहीं बचा। शब्दों में हाय-हलो हावी हो गया है। लेकिन लखनऊ के मामलों पर गहरी जानकारी रखने वाले जाफर अब्दुल्ला कहते हैं- लखनवी जुबान तो हवा का वो झोंका है जो जीवन में रंग भर देता है। दुनिया के किसी भी कोने में यदि आपको अपनी बेगम को ही आप कहने वाले कोई साहब मिल जाएं तो उनसे जरूर पूछिएगा, जनाब क्या आप लखनऊ के हैं? लखनऊ के ही प्रसिद्ध लेखक और इतिहासविद् योगेश प्रवीन की ये लाइनें लखनवियत को बताने के लिए काफी हैं-

ये सच है जिंदादिली की कोई किताब है तू।
अदब का हुस्नो-हुनर का हसीं शबाब है तू।
सरे चमन तेरा जलवा है वो गुलाब है तू।
लखनऊ आज भी दुनिया में लाजवाब है तू।

(http://navbharattimes.indiatimes.com/thoughts-platform/viewpoint/lucknow-and-its-culture/articleshow/21779349.cms)

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शुक्लजी, बहुत शुक्रिया इस लेख के लिए…अब आपने लखनवियत की बात की है तो कहीं बहुत पुराना पढ़ा एक शेर याद आया लखनऊ के शुक्रगुज़ार होने पर –

‘मुमकिन नहीं कि कर सकूं मैं शुक्रिया अदा
लेकिन शुक्रगुज़ार हमेशा रहूँगा मैं’

Lucknow

Written by RRGwrites

August 13, 2013 at 11:54 AM

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