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Capability and Career-Growth Go Hand-In-Hand

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RRGwritesSharing something that a young HR professional recently said. Thought-provoking words that have stayed with me…

This one’s a bright and promising junior of mine from college, with whom I was exchanging a few emails a while ago. He works for a large Indian IT multinational and had been associated with the company for over seven years now; he joined them right after MBA school. He performed well and consequently, has climbed up the ladder at a speedy and consistent pace.

During the conversation, I remarked on his consistent growth within the organization and as his proud senior, expressed my admiration. He responded in measured words. Words of wisdom, I would say; something that young managers don’t speak too often, at least whilst referring to the pivotal cross-linkage that depth of learning has with career-growth.

I am quoting him:

“…My career priority is to build depth. Growth has been incidental…”

Sharing this with all budding professionals; these are words their worth in gold.

As someone who interacts with young professionals and management students extensively, I often observe a disturbing mismatch between the aspirations of management professionals vis-a-vis their quest & hunger for knowledge – the real mastery… In fact, I wrote a blog on this a while ago – (MBA की ‘मास्टरी’)

Let me know what you think. If you are a young professional entering the corporate world or a management student; I would love to know your thoughts…

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Image-credit: venuscablejoints.com

MBA की ‘मास्टरी’…

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Inspirational-Picture-Quote-Hard-Work-and-Learningपिछले कुछ महीनों में कई विद्यार्थियों से मुलाकात करने का मौका मिला। अनेक प्रबंधन संस्थानों में पढ़ने वाले इन छात्रों से मिलना, उनसे बातें करना, उन्हें कभी-कभार कुछ सिखा पाने में मुझे एक अलग ही सुकून मिलता है। अपनी खुद की पढ़ाई के दिनों में मैंने इतने बच्चो, और कई बार समकक्षों को भी, ट्यूशन पढ़ाये कि अब तो ये आदत मेरे खुद का हिस्सा हो गयी है। और फिर, कॉर्पोरेट जगत में आया तो सीखा कि अच्छा और वास्तविक लीडर तो जी वो है तो पहले अच्छा टीचर हो। फिर तो ये आदत काम आने लगी और जैसा कि कहते हैं, अब एक ‘सीरियस हॉबी’, यानी ‘गंभीर शौक’ सी हो गयी है।

मैं भटक रहा हूँ; बात हो रही थी प्रबंधन के छात्रों की… अगर हम कुछ शीर्ष के, IIM, ISB सरीखे कुछ चुनिन्दा कॉलेज छोड़ दें, तो कुछ सालों से मुझे ऐसा प्रतीत होने लगा है कि शहरों-कस्बों में कुकुरमुत्तों के रूप में उग आये मैनेजमेंट कॉलेजों में पढ़ने वाले MBA के छात्रों में कुछ अजीब से जल्दबाज़ी, एक भागम-भाग सी हो गयी है। कमोबेश, यही हालत उन कॉलेजों की भी है जो हैं तो पुराने और स्थापित, पर पठन-पाठन, अध्यापकों-छात्रों के स्तर और मूल-भूत व ढांचागत शिक्षण सुविधाओं में काफी पीछे हैं। अमूनन, यह पढ़ाई दो साल की होती है। पर मैं तो देखता हूँ कि ज़्यादातर छात्र इस दौड़ में हैं कि कैसे, फटाफट से एक नौकरी मिल जाये, जो हज़ारों-लाखों रूपये महीने की तन्ख्वा देवे। बाकी सारे काम, जिसमे पढ़ना भी शामिल है, पीछे हो जाते हैं। हर काम कुछ इस वजह को दिमाग में बैठा के किया जाता है कि कैसे किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी में नौकरी पा जाएँ। फिर तो दुनिया अपनी जेब में होगी और आसमान मुट्ठी में!

मैं इस सोच से चकित हूँ। अरे, गुरु लोगों, ये जुगाड़ तो सब ठीक है, पर असली मुद्दे – पढ़ाई और काबिलियत का क्या होगा? आखिर MBA के M का मतलब तो ‘मास्टर‘, माने उस्ताद है। और उस्ताद तो तभी होते हैं जब अपने फन में इतने माहिर हो जाएँ कि लोग हमारी उस्तादी का लोहा मानने लगें। और एक छात्र के लिए अपने विषय पर पकड़ ही उसकी उस्तादी – मास्टरी है। फिर समझना मुश्किल है कि इस पढ़ाई में जल्दबाज़ी का क्या काम! और स्कूल या ग्रेजुएशन की बात थोड़े न हो रही है, यहाँ तो उस पढ़ाई की बात हो रही है जिसके बाद छात्र, छात्र नहीं रहते, मास्टर, मैनेजर, लीडर, कंसलटेंट और न जाने क्या बन जाते हैं, हज़ारों-लाखों रूपए बनाते हैं अपने कौशल से। सोचिये, सिर्फ मैं बड़ा डॉक्टर बनू, फटाफट, ये सोचते हुए कोई डॉक्टरी पास होता जाये तो वो क्या खाके इलाज करेगा। वैसे ही, जल्दी से पहला साल बीते, summer training मिले और फिर 6 महीने और एक लल्लन-टाप नौकरी, इस झटपट रफ़्तार से की गयी पढ़ाई से क्या ख़ाक आप और मैं ‘मास्टर’ बनेंगे! कोई आश्चर्य की बात नहीं जब अब से कुछ समय पहले एक सर्वे ने छापा था कि ज़्यादातर मैनेजमेंट कॉलेजों के अधिकतम छात्र मैनेजमेंट की नौकरी कर पाएं, ऐसे गुणों का आभाव रखते हैं। और फिर चलो मान लें कि कैंपस इंटरव्यू में अच्छा इम्प्रैशन जमा के नौकरी मिल भी गयी, तो क्या वो एक सफल करियर की गारंटी है?

मुझे याद पढ़ता है कि जिन दिनों मैं पूना के Symbiosis लॉ कॉलेज में पढ़ाई कर रहा था; प्रिंसिपल साहब, डा. रास्ते, ने एक दिन लाइब्रेरी में मुझे पढ़ते देखा और शायद खुश हो के एक गुरुमंत्र दिया, “बेटा, इन तीन सालों में जितना पढ़ सकते हो, पढ़ लो। खूब किताबें छानों क़ानून की और इस लाइब्रेरी का खूब फायदा उठाओ, बेशरम बनों और बहुत सवाल पूछो अपने प्रोफेसरों से… क्योंकि जब तुम वकालत करना शुरू कर दोगे या नौकरी करोगे, तो पढ़ने का बिलकुल समय नहीं मिलेगा…”

आप मुझे ग़लत न समझें; ऐसा नहीं है कि सभी MBA के छात्र पढ़ना नहीं चाहते। जैसे शीर्ष के मैनेजमेंट कॉलेजों में, छोटा ही सही, एक तबका नालायकों का होता है, वैसे ही इन छोटे संस्थानों में एक छोटा सा तबका उन छात्रों का होता है जिनमे सीखने की अदम्य लालसा होती हैं। ये तबका चाहे बड़े शहरों में कॉलेजों में हो या कस्बों के, सीखने की धुन में रास्ते खोज ही लेता है। यह रोज़ अपने-आप को बेहतर बनाना चाहता है, और बिलकुल हठधर्मिता से अपने आप को ‘मास्टर’ बनाने में जुटा रहता है। ये सिर्फ एक अदद नौकरी नहीं चाहते, ये एक बेहतर करियर बनाना चाहते हैं और इस विश्वास से पढ़ते हैं कि अगर अच्छा पढ़ जायेंगे, अपने आप को उस्ताद कहने का जायज़ हक़ हासिल कर लेंगे, तो नौकरी तो मिल ही जाएगी, साथ ही एक लम्बे, सफल करियर की मज़बूत नींव भी पड़ जाएगी।

बहुचर्चित फिल्म ‘लगान’ में भुवन के रोल में आमिर खान ने क्या खूब कहा है, “चूल्हे से रोटी निकलने के लिए चिमटे को अपना मुँह जलाना ही पड़ता है…।”

जले हुए, पर मज़बूत और सदा-उपयोगी चिमटे से सीखते हुए ऐसे ही छात्र M से ‘मास्टर’ बन के निकलेंगे, अपने कार्य-क्षेत्र में सफलता के नए आयाम स्थापित करेंगें, और गुरुदेव रबिन्द्रनाथ ठाकुर के शब्दों में, ‘सफल होने के साथ ‘सार्थक’ भी बनेंगे’, ऐसा मेरा विश्वास है।

आप क्या सोचते हैं, बताईयेगा…

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