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Posts Tagged ‘Indian Politics and Religion

When will we not have religion rule our politics?

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It is election time in the largest democracy of the world – India. INDIA – A land, where “…we are all drunk on change”, as I read Sir Mark Tully quoting an Indian sage.

Indian Politics and ReligionI am baffled, though. Every time I switch on the TV, I hear terms like – Hindu, Muslim, Dalit, Sikh, Jat, Yadav… And everyone uses these terms – whether it is the proclaimed Dealer-of-Hope, change-specialist Narendra Modi, or the Ray-of-Hope for Congress – Rahul Gandhi. Sonia, Priyanka, Rajnath, Arun Jaitley, even AK – everyone without an exception does that. National Leaders or the regional ones – Mulayam, Mamata and Maya alike!

Quite evidently, no one is wooing just an Indian!

If we are so drunk on change as a nation, and this is claimed to be the most crucial elections this country has ever witnessed, I wonder when will a time come when I will switch on the television and NOT hear these divisive terms, and our country, society and polity will only be concerned and talking about us just as citizens, just as Indians!

In my lifetime? Not sure…and yet, hopeful.

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Image-credit: indianmuslimobserver.com

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गरीबी, धर्म… और वोट…

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गरीबी, धर्म… और वोट

with one comment

vote-bank‘ना मो‘ और ‘रा गा’, और उनकी पार्टियों के बीच मची चुनावी खींचतान तेज़ होती जा रही है। बसपा, सपा, नितीश तो अपनी जगह हैं ही। और जब चुनाव करीब हों, तो धर्मं के ऊपर राजनीति होना इस देश का बड़ा ही पुराना दस्तूर है। इसी परंपरा के तहत हिंदुओं और मुसलमानों के हिमायती भाषणों की बाढ़ सी आयी हुयी है। जहाँ देखो वहाँ दोनों ही धर्मो के मानने वाले मतदाताओं के आर्थिक और सामाजिक पिछड़ेपन पर एक पार्टी का नेता  दूसरी पार्टी के नेतृत्व को कोसता मिल जाएगा, ये वादा साथ में करते हुए कि कैसे सिर्फ उसकी पार्टी अमुक धर्म वालों की सबसे बड़ी संरक्षक और पालक है। या कैसे किसके पास किस धर्मगुरु या किस मौलवी का समर्थन और आशीर्वाद है, वगैरह-वगैरह…

जनता – दोनो ही धर्मों को मानने वाली – हमेशा की तरह सुन रही है…

और मैं, हमेशा की तरह, कुछ स्तब्ध सा हूँ…

आज़ादी के 66 सालों के बाद भी दो मुद्दे ताज़ा हैं; हर एक पार्टी के इलेक्शन मैनिफेस्टो का हिस्सा – गरीबी-उन्मूलन और धार्मिक-भावनाएं! अब कोई इनसे पूछे कि भाई, अगर आज़ादी के इतने सालों के बाद भी गरीबी न सिर्फ जारी है, बल्कि दिन-ब-दिन बढ़ती ही जाती है, तो इन महान राजनीतिज्ञों ने कौन से कद्दू में तीर मारा अपने-अपने राज में? चुनाव-दर-चुनाव किये गए सैकड़ों ‘गरीबी-हटाओ वायदों’ के बावज़ूद अगर ‘गरीबी’ आज इतने वर्षों के उपरांत भी निरंतर पनप रही है, तो क्या लानत नहीं भेजनी चाहिए इन सरकारों पर?

और धर्म? उसके तो क्या कहने! सन 2014 में भी ये मुद्दा है!! आज भी हम में से अधिकतर लोग (वो तबका जो वोट डालने जाता है!), इसी आधार पर अपना वोट कुर्बान कर आते हैं। कुछ इस मानसिकता के साथ कि जात-भाई ना जीता, तो हम पर धिक्कार है… आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक, इत्यादि-इत्यादि विकास कार्य तो अलग मुद्दे हैं, वो सब तो चलते रहते हैं…

हिंदी भाषा के महान लेखक, रामधारी सिंह दिनकर ने एक जगह कहा है:

“संस्कृति ज़िन्दगी का एक तरीका है और ये तरीका सदियों से जमा होकर उस समाज में छाया रहता है, जिसमे हम जन्म लेते हैं।”

मैं शहरे-अवध लखनऊ की गंगा-जमुनी संस्कृति का बाशिंदा हूँ; बचपन से मेरे मित्र सभी धर्मों के थे, आज भी हैं। मिशनरी स्कूल में हिन्दू और मुस्लिम दोनों पढ़ते थे, हम अपने सिख दोस्तों के साथ गुरूद्वारे जाते और जब भी मौका मिले, बंगाली रसगुल्ले नाक डुबो-डुबो कर खाते। जब कभी हम आपसे में लड़ते-भिड़ते, वो मजहबी रंग न लेकर दो छोरो की आपसी लड़ाई मानी जाती थी। होली और ईद, दोनों पर खुश होना हमने सीखा। दीवाली पर खील-बताशों के माफ़िक ईद पर सिवईंयां मैं आज भी खोजता-लाता हूँ। मेरे लिए ये ज़िन्दगी जीने का तरीका, मेरी संस्कृति है। हमारे वालिद साहब कहा करते थे, “जो धारण करने योग्य है, वही धर्म है।” ये सीख बहुत बचपन से मेरे साथ रही। तब तो, कम-स-कम मेरे बचपन के दिनों में, हिन्दू अगले और मुस्लिम पिछड़े या मुस्लिम आगे और हिन्दू पीछे – ऐसा नहीं होता देखा मैंने।

फिर ऐसा क्यों कि आने वाले चुनावों में एक बेचैन कर देने वाली मानसिकता हमें वोट डालने आमंत्रित कर रही है? और वो काफी हद तक सफल होती भी दीखती है! क्यों?

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Image-credit: mysay.in

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