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चांदी की परत…

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काम के दौरान बहुत से शहरों और कस्बों में जाना होता रहता है; मैं बाजारों में, माल्स में, सड़कों पे बहुत घूमता हूँ। मुख्यता: भोजन के लिए अनेकानेक ढाबों, रेस्तरां, इत्यादि का चक्कर भी ज़रूरी हो जाता है। युवजनों से अटे-पटे ये कैफ़े, रेस्तरां, फ़ूड-कोर्ट्स, काफी कोलाहल से भरपूर हैं; कई नए लोगों से मुलाकात होती है और ना चाहते हुए भी बहुत तरह की बातें कानों में पड़ जाती हैं।

ये बातें अधिकतर कुछ इस तरह की होती हैं – कौन सी नई कार या  SUV आयी है, नयी फिल्म क्या लगी है, किस ब्रैंड ने नए जूते, माफ़ कीजियेगा, नए ‘cool’ जूते लॉंच किये हैं। नई मोटरसाइकिल, नया घर या ज़मीन, नई डायमंड रिंग… इस भागते हुए भारत में मानो उपभोक्तावाद, ‘consumerism’ ने हमारी बातचीत की कला का अपहरण कर लिया हो। कुछ ऐसा महसूस होता है जैसे ‘मैं, मेरा’ हमारे प्रमुख शब्द हैं। ऐसा भी नहीं कि ये बातें सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित हों, लगभग हर कस्बे का हाल कुछ ऐसा ही है।

आप मुझे ग़लत न समझें, ये शिकायत नहीं है। कुछ मायनों में देश अच्छा कर रहा है, एक ख़ास तबके की आमदनी भी बेइन्तहा बढ़ रही है और उसके साथ बेहिसाब खर्च करने योग्य पैसे भी बढ़ रहे हैं… सोना और घर, दोनों ही महंगे होते जा रहे हैं और फ़िर भी ख़रीदे जा रहे हैं… अच्छा ही होगा फ़िर तो।

साथ-साथ हमारी बातचीत के दायरे भी सिमटते जा रहे हैं, मानो ज़िन्दगी पे एक चांदी की परत चढ़ रही हो…

जब भी ऐसी बातें कान में पड़ती हैं तो किशोरावस्था की एक घटना दिमाग में गूँज जाती है। उन दिनों मैंने दसवीं कक्षा का इम्तेहान दिया था, चेहरे-मोहरे पे ध्यान देना भी शुरू हुआ ही था… आप तो जानते ही हैं कि ये ही तो उम्र है जब हम आईने में खुद को कुछ ज्यादा ही देर तक निहारते हैं 🙂 नहीं?

Mirrorएक ऐसे ही दिन की बात हैं जब बाबा के एक मित्र, जो बड़े ही दीनी आदमी थे और जीवन की दुनियादारी के साठ बसंत देख चुके थे, हमारे घर पर चाय पी रहे थे। मैं कहीं जाने को तैयार हो रहा था और बार-बार आईने में खुद को देखके मानो ‘बाहर जाने योग्य हूँ’ की मोहर लगा रहा था।

मुझे ऐसा करते देख वो अर्थपूर्ण रूप से मुस्कुराये… कुछ पलों तक देखते रहे मानो वक्त को तोल रहे हों… फ़िर बोले,

“बर्खुरदार, क्या दिख रहा है आईने में आपको?”

मैं अचकचाया; मन में खुद से सवाल किया, क्या पूछना चाह रहे हैं? थोड़ी झेप भी हुयी शीशा देखते पकड़े जाने की। इच्छा नहीं हुयी ज़वाब देने की, पर कुछ लखनऊ की तहज़ीब वाली परवरिश और वालिद साहब की मौजूदगी ने जवाब निकलवा ही लिया, “जी, आईने में खुद को देख पा रहा हूँ।”

“देखिये तो, खिड़की में कि क्या दिख रहा है?” दूसरा सवाल आया।

“जी, बाहर पड़ोस वाले पप्पू अंकल दिख रहे हैं, नौकर सफाई कर रहा है, दूधवाले भैय्या आयें हुए हैं, गमले रखे हैं” हम ने सच बयां किया।

“क्या फर्क है दोनो शीशों में?” एक और सवाल…

उम्र के अनुकूल खीज तो हुयी, पर सब्र करते हुए हमने जवाब दिया, “जी, आईने में शीशे के पीछे चांदी की पॉलिश की हुयी है, इस लिए आर-पार नहीं दिखता; खिड़की के शीशे में पॉलिश नहीं है तो बाहर का दृष्य भी दिखता है…”

“तो बर्खुरदार, एक बात गाँठ बांध लो, जब तक ज़िन्दगी के आईने पर चांदी की परत नहीं चढ़ेगी, और लोग और बाकी दुनिया भी दिखाई देगी। पर जिस दिन जीवन-रुपी शीशे पर ये परत चढ़ जाएगी, आदमी सिर्फ और सिर्फ खुद को देख सकेगा। आप जीवन में बहुत आगे जाएंगे, कोशिश कीजियेगा की ये चांदी की परत आपकी नज़र कमज़ोर न कर दे…”

मैं स्तब्ध था, वालिद साहब मुस्कुरा रहे थे, और आईना मुझे देख रहा था…

आज तक कोशिश ज़ारी है कि ये चांदी की परत न चढ़े…

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Photo-credit: playquestadventureplay.co.uk

Written by RRGwrites

March 8, 2013 at 6:30 PM

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