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Four Thoughts On Leadership…

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Leadership Towers & Foundations

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My Guiding Words for 2016

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2016Over the period of years, at the outset of each new year, I pen down my intentions – words & thoughts that guide me throughout the year. At times, these are the pieces that I learnt the hard way during the preceding year, or somethings that I read or heard and which stayed with me. I note them down, and they become my reminders for the year-round.

For the year 2016, here they are:

  1. Will cut down on time taken during the decision-making process. Will watch and act against time wasted in unnecessary meetings and reviews.
  2. Won’t attend all arguments I get invited to. Simply, won’t. Will stay away from people bringing negative energy. Two-feet distance, at least.
  3. Will authentically look out for at least one good deed every day – done by anyone around me. Will thank the person before the day ends. Delayed and/or unexpressed gratitude isn’t useful to anyone.
  4. Will call a spade by no other name. Will stay polite when I do so.
  5. Will continue to focus and work on the strengths of my team. Will keep pushing them to excel. Give more credit and take more blame as a leader.
  6. Will be a better spouse. Find lesser faults with and show more affection and respect to wify Neha.
  7. Will teach my son Rajvir how to swim.
  8. Will give higher attention to my health; and not merely via lip-service. Will go on vacations; will encourage my team to do so too. Will choose happiness and choose to spread it.
  9. As Jeff Weiner recommended, will dream big, get shit done and have fun while I do so.

The intention behind writing my guiding principles and goals is simple – it inspires me everyday to achieve them, stay true to them. That’s what I will try and do with above nine intentions for 2016.

What are yours?

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PS: Here are the links to my guiding principles earlier years. You you liked reading the above post, chances are, you’d like these too:

Written by RRGwrites

January 3, 2016 at 3:17 AM

गाँधी की मूरत और भगत सिंह के विचार – क्या चुनेंगे आप?

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Gandhi at London Square

कुछ दिनों से गाँधीजी की प्रतिमा की बड़ी चर्चा है – वो जो लंदन के पार्लियामेंट स्क्वायर पर ब्रिटिश सरकार ने लगाई है। चर्चा का मौजूं कुछ यों है कि क्या मूर्ति वास्तव में गाँधी बाबा के शक्लो-सूरत की है, या बहु-प्रसिद्ध और सफ़ल फ़िल्मकार सर बेन किंग्सले के जैसी दिखती है, वही जिन्होंने ‘गाँधी’ फिल्म में बापू की भूमिका निभायी थी।

मैं स्तब्ध सा हूँ। आज वास्तविक शहीद दिवस है, २३ मार्च, और हमारे चिंतन का विषय इतना बुतपरस्त और इतना पथरीला है…

दो साल पहले मैंने यह लेख लिखा था,  आज ही के दिन… कुछ भी नहीं बदला शायद…

‘विचारों की सान पर…’

आज ‘असली शहीद दिवस’ है – बस हम जानते नहीं हैं।

शहीद शिवराम राजगुरु, शहीद सुखदेव थापर और शहीद सरदार भगत सिंह 23 मार्च 1931 को अपना बलिदान दे कर जा चुके हैं। देश स्वतंत्र भी है, शायद। कम से कम किसी दूसरे देश का गुलाम नहीं है, बाकी तरह की गुलामियत के बारे में नहीं कहता।

भगत सिंह ने जीवन के कुल 23 वर्ष ही पूरे किये। जितना ज्यादा मैं जानता-पढ़ता हूँ उनके बारे में, मेरा आश्चर्य बढ़ता जाता है कि इस छोटी सी उम्र में उनके सोचने-समझने की क्षमता कितनी जागृत और परिपक्व थी। क्या आप जानते हैं उनके विचार और लड़ाई सिर्फ ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ ही नहीं थी; सामाजिक पिछड़ेपन, साम्प्रदायिकता, अकर्मण्यता और विचारों के क्षेत्र में अन्धविश्वास के विरुद्ध भी उनकी लड़ाई थी? शायद आज का युवक ये जानता ही नहीं। और ऐसा क्यों न हो, जब हमारी अपनी ‘स्वतंत्र’ सरकारों ने ही हमारे क्रांतिकारियों के विचारों को, उनकी याद को, महज एक ‘धन्यवाद्’ का रूप दे रखा है जो आज के दिन की तरह समाचार-पत्रों में एक-चौथाई पेज में छपता है, बस।

भगत सिंह के बारे में बात करते हुए एक जगह ‘शहीद भगत सिंह शोध समिति’ के डॉ. जगमोहन सिंह और डॉ. चमन लाल ने लिखा है (पुस्तक: ‘भगतसिंह और उनके साथियों के दस्तावेज’) –

“…आज सबसे बड़ी ज़रूरत इस बात की है कि शहीद भगत सिंह के मूल वैचारिक तत्त्व को जाना व समझा जाये। यह पहचानने की ज़रूरत है कि वे कौन से सिद्धान्त थे, कौन से तरीके थे और कौन से गुण थे, जिससे भगत सिंह आत्म-बलिदान करनेवालों में सबसे ऊँचे स्थान के अधिकारी बने? वे कौन सी परिस्थितियाँ थीं, जिन्होंने भगत सिंह को भारतीय चेतना का ऐसा अन्श बनाया कि एक ओर तमिलनाडु में उन पर कविताएँ लिखी जाती हैं तो दूसरी ओर भोजपुर में होली के गीत में ‘भगत सिंह की याद में अँचरिया भीग जाती है।’ लेकिन ऐतिहासिक दुखान्त यह भी घटता है कि जब वर्तमान की समस्याओं का सामना करने के लिए हम अपने अतीत से उदाहरण खोजते हैं तो अतीत के सारतत्व को नहीं, उसके रूप को अपनाने की कोशिश करते हैं, जैसा कि भगत सिंह व उनके साथियों के साथ सरकारी और कुछ अन्य प्रचार-माध्यमों ने किया है।”

लेखकगण आगे लिखते हैं,

“शहीद भगत सिंह न सिर्फ वीरता, साहस, देशभक्ति, दृढ़ता और आत्मा-बलिदान के गुणों में सर्वोत्तम उदाहरण हैं, जैसा कि आज तक इस देश के लोगो को बताया-समझाया गया है, वरन वे अपने लक्ष्य के प्रति स्पष्टता, वैज्ञानिक-ऐतिहासिक दृष्टिकोण से सामाजिक समस्याओं के विश्लेषण की क्षमता वाले अद्भुत बौद्धिक क्रांतिकारी व्यक्तित्व के प्रतिरूप भी थे, जिसे जाने या अनजाने आज तक लोगो से छिपाया गया है।”

मैं समझता हूँ कि यह सच बात है कि हमारी सरकारों ने भगत सिंह और अन्य साथी क्रांतिकारियों के विचारों की पूर्णता को जन-मानस के सामने लाने का कार्य नहीं किया है। पर क्या ये भी सच नहीं है कि देश के नागरिकों ने, युवा-समाज ने भी अपनी ओर से ईमानदार कोशिश ही नहीं की है जानने की? क्या आज भी हम भगत सिंह का सिर्फ क्रांतिकारी स्वरुप नहीं जानते? और क्या हमने कोशिश की है कि हम भगत सिंह के बौद्धिक और वैचारिक स्वरुप को जान पाएं और उनसे सीखें?

कई बार सुनता हूँ कि किस प्रकार से देश में नेतृत्व का अभाव है, ज्ञान का तो और भी ज्यादा। शिकायत है कि नेता नहीं मिलते। और सिर्फ राजनीति की बात नहीं हो रही यहाँ पे, कार्य-क्षेत्र में तो नेतृत्व-क्षमता के अभाव का रोना लगभग रोज़ ही सुनता हूँ। आप भी शायद मानेंगे। पर फिर पूछने की इच्छा होती है कि क्या हम वास्तव में सीख रहे हैं पुराने नेतृत्व से, विचारों से? वो नेतृत्व और विचार जो सिर्फ समय के हिसाब के पुराने होंगे, पर परिपेक्ष्य, उपयोगिता और प्रासंगिकता के हिसाब से बेहद कारगर हैं आज…

“स्वतंत्रता का पौधा शहीदों के रक्त से फलता है”, भगत सिंह ने लिखा था। शहीद राजगुरु, शहीद सुखदेव और शहीद सरदार भगत सिंह के विचारों व कर्मों से रोपित और रक्त से संचित आज ये पौधा भले ही पेड़ बन गया हो, मीठे फ़लों से बहुत दूर है।

आओ दोस्तों, आज शहीदी दिवस पर ये प्रण लें कि जानना शुरू करेंगे उन सिद्धांतो को, उन विचारों को, जिन्होंने एक 23-वर्षीय युवक भगत को ‘शहीद सरदार भगत सिंह’ बनाया। शायद ये हमारे भी कुछ काम आ जायें…

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मैंने लंदन स्क्वायर पर स्थापित गाँधी-मूर्ती का एक चित्र देखा… कुछ चिंतामग्न प्रतीत होते हैं वो। क्या हम भी चिंतन करेंगे कुछ आज? बताइएगा…

Written by RRGwrites

March 23, 2015 at 12:09 AM

It Is Time For Leadership

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Time for LeadershipSometimes, in the normal course of the day, one gets to hear most basic and yet, most profound statements. Sharing something similar that I heard last week.

Sitting in a sales-team meeting of senior managers, I heard a lot of them mentioning about challenging external business environment and toughening regulatory controls. In one voice, almost everyone opined that it is becoming increasingly difficult to manage the pressures of performing amidst the changing, rather non-favourable conditions of doing business.

Mood was palpably intense, I could sense.

One senior manager, who was sitting quietly in the room till now, remarked,

“Things are indeed difficult. And that’s why, this is the time for leadership!”

What are profound statement! Leadership simplified!

Wherever there is chaos, adversity, challenges, you need leadership to come forward, to pave way, to show how it done, so face the music and to lead by example.

Don’t you agree?

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Image-credit: people-onthego.com

Written by RRGwrites

September 18, 2014 at 2:03 PM

Connect Over LinkedIn – Only With A Reason…

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Connect For A ReasonEveryday, I receive over a dozen connection-invites over LinkedIn. I did a check today – in the last 20 days, only 2 of the connection requests actually came with a real request or a note, stating their reasons to connect with me. Awfully small percentage, isn’t it?

This trend was under my observation for some good time now… and I wanted a solution. So, about a month ago, I clearly defined my thoughts under my profile’s section on ‘Advice For Contacting…’, outlining thus; “If you wish to connect with me and are sending an invite, please do share the reasons for connecting with me; if we share something in common or there’s something to build upon. I would not treat LinkedIn as a ‘friend’s request’ platform. Thank you.”

Yet, no avail! Such blind requests continue to pour in even as this goes into publication…

If you are on this professional network, I am sure you too receive similar requests… And I can safely hedge that the stats in your case won’t be much different. And that certainly isn’t professional by any yardstick. It is quite akin, I would say, to turning up in a formal interview attired in distressed denims!

Simple thought – if you wish to connect with someone over LinkedIn you already don’t know in real life, please state the reasons for connecting. Everyone’s reason to connect may differ – it may be asking for a job, asking for an advice or help, or simply because there is any other common interest area between you two – it will help the real cause of networking.

I am sure, if you were to go back to your LinkedIn contacts and do a random check, you would locate several contacts with whom we connected for no reason, and those who haven’t really ‘connected’ after connecting initially over LinkedIn! Quite naturally, such a connection would have made no positive difference to each other.

That not what LinkedIn was made for, if I recall it right!

Do you agree?

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Image-credit: linkedstrategies.com

HR and it’s Customers & Products…

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Seth GodinI came across this image online today and couldn’t help drawing a parallel and thinking about us HR folks. Do we innovate and create useful & beneficial products and/or solutions for our customers – the business fellas – as a part of our work-life, helping business do better….

OR,

we simply try and offer the same old, tried and tested HR agenda to them in a fancy, customized manner, helping our KRAs get completed?

Think about it…

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