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स्याही का रंग…

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Ink RRGwritesआजकल मैं बड़ा विचलित हूँ। गाय को ‘माँ’ कहने वाले, एक-दूसरे की माँओं को गाली दे रहे हैं। दूसरी तरफ, मज़हबी हाशिये की तुच्छ राजनीति करने वाले कुछ अहमक़ सियासतदां जानते-बूझते इस जम्हूरियत में छेद करके UN जाना चाह रहे हैं और यह जता रहे हैं कि कैसे इक ख़ास किस्म के गोश्त के टुकड़े की भूख़ पूरे देश के भूखे मरते आवाम से बड़ी है। कहीं तो स्याही का रंग इतना वीभत्स हो चला है कि वो लिखने के लिए नहीं, मुँह काले करने के काम आ रही है, ऐसे कि भगवे रंग के हिमायती भी भगवा छोड़ इस काले रंग के मुरीद हो चले हैं। कौन भारतीय हिंदुस्तान में रहेगा और कौन पाकिस्तान जाये, ये बताने वाले कितने सारे हो गए हैं। दूसरी ओर, स्याही के सिकंदर लिख कर विरोध ना जता कर, सरकारी और गैर-सरकारी पुरस्कार वापस कर के जता रहे हैं। जानवरों की ऱक्षा करने के लिए टीवी चैनलों पर इतनी चिंता बिखरी हुयी है कि दिल्ली महानगर में होते मासूमों के बढ़ते दुराचारों की भयावह चीखें नक्कारखाने में बजती तूतियों के समान प्रतीत होती दीखती हैं।

इतनी नकारात्मकता फैली है… अजब हड़बोंग मचा है चारो ओर.… संस्कृति और धर्म के नाम पर। गाय के नाम पर, सारे-के-सारे बछिया के ताऊ, यानी बैल, हुए जा रहे हैं। सुर्खियां और वोट बटोरने के लिए धर्म का बाजार गर्म है।

हिंदी भाषा के महान लेखक, रामधारी सिंह दिनकर ने एक जगह कहा है:

“संस्कृति ज़िन्दगी का एक तरीका है और ये तरीका सदियों से जमा होकर उस समाज में छाया रहता है, जिसमे हम जन्म लेते हैं।”

मैं शहरे-अवध लखनऊ की गंगा-जमुनी संस्कृति का बाशिंदा हूँ; बचपन से मेरे मित्र सभी धर्मों के थे, आज भी हैं। मिशनरी स्कूल में हिन्दू और मुस्लिम दोनों पढ़ते थे, हम अपने सिख दोस्तों के साथ गुरूद्वारे जाते और जब भी मौका मिले, बंगाली रसगुल्ले नाक डुबो-डुबो कर खाते। जब कभी हम आपसे में लड़ते-भिड़ते, वो मजहबी रंग न लेकर दो छोरो की आपसी लड़ाई मानी जाती थी। होली और ईद, दोनों पर खुश होना हमने सीखा। मंगलवार को हिन्दू दोस्त गोश्त नहीं खाते, इस वजह से हमारे मुस्लिम दोस्त-यार ख़ुशी और पूरे मन से शाकाहारी खाना खा लेते थे, ना कि मज़हबी आज़ादी के नाम पर ‘बीफ पार्टियां’ आयोजित करते। दीवाली पर खील-बताशों के माफ़िक ईद पर सिवईंयां मैं आज भी खोजता-लाता हूँ। मेरे लिए ये ज़िन्दगी जीने का तरीका, मेरी संस्कृति है। हमारे मरहूम वालिद साहब कहा करते थे, “जो धारण करने योग्य है, वही धर्म है।” ये सीख बहुत बचपन से मेरे साथ रही। तब तो, कम-स-कम मेरे बचपन के दिनों में, हिन्दू अगले और मुस्लिम पिछड़े या मुस्लिम आगे और हिन्दू पीछे – ऐसा नहीं होता देखा मैंने।

इस मज़हबी गैर-रवादारी और राजनीतिक असहिषुणता ने सारे देश में एक बेचैन कर देने वाली मानसिकता पैदा कर दी हैं। और वो काफी हद तक हमें बाँटने में सफल होती भी दीखती है!

पर क्यों?

Written by RRGwrites

October 19, 2015 at 7:01 PM

थोड़ी सी करुणा, बहुत सारा सुक़ून…

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RRGwritesपहली कहानी: कुछ दिन पहले मैं दफ्तर से निकल कर कनॉट-प्लेस के ट्रैफिक-सिग्नल पर रुका हुआ था। शाम का वक़्त था और हमेशा की तरह बेहद भीड़ थी। मेरा दिन भी कुछ थका देने वाला था; भूख भी लगी थी। मैंने बैग में देखा, दो केले रखे हुए थे। बीवी को मन-ही-मन धन्यवाद देते हुए मैंने शुरुआत की। कुछ यूं ही अचानक बाएं तरफ के फुटपाथ पर नज़र पड़ी – एक छोटा सा बच्चा खड़ा हुआ था – उन मे से एक जिन्हे माँ-बाप सिर्फ आमदनी के ज़रिये बनाकर पैदा करते हैं। वो मुझे ही नज़रें बांधें देख रहा था…

मैंने उसे इशारा करके पास बुलाया, जीप का शीशा नीचे कर के एक केला उसे देने को हाथ बढ़ाया… वो अपनी जगह से हिला भी नहीं। मैंने मुस्कुरा के आवाज़ दी, “ले ले यार.…”… वो बेहद धीमी गति से पास आया, और सहमते हुए मेरे हाथ से केला ले लिया। एक पल उसने मुझे ग़ौर से देखा, और फिर एक बेहद मार्मिक, सरल मुस्कराहट मेरी तरफ उछाल दी… और उस फ़ल को अपने छोटे से सीने से लगा के दौड़ पड़ा, शायद अपने दोस्तों को दिखाने…

मैं आपको बताऊँ, बड़े समय के बाद इस करोड़ों लोगों के महानगर में इतनी निश्छल, निःस्वार्थ व बाल-सुलभ मुस्कान देखी। दिन बन गया! उसके बाद अगले डेढ़-घंटे का ट्रैफिक से भरा दिल्ली-से-गुड़गाँव का सफर, जिसे रोज़ाना मैं झींकते-खीज़ते पूरा किया करता हूँ, उसी पूरे रास्ते उस रोज़ मेरे चेहरे पर एक मुस्कराहट रही, शायद उस बच्चे की ख़ुशी के प्रतीक के रूप में…

दूसरी कहानी: दिल्ली-गुड़गाँव में इस बार झुलसा देने वाली धूप और गर्मी है। तक़रीबन दो हफ़्ते पहले ऐसे ही एक तपते रविवार को घर बैठे मैंने अखबार में पढ़ा – गुड़गाँव शहर की इस गर्मी में तक़रीबन तीन-चार सौ तोते और सात-आठ सौ कबूतर गरमी से आहत हो कर दम तोड़ चुकें हैं। लिखने वाले ने कम होते पेड़ों, बढ़ती बहुमंज़िला इमारतों और पक्षियों के लिए घटते दाने-पानी और छाँव का ज़िक्र किया, और जनता से गुज़ारिश की कि अग़र संभव हो, तो मिट्टी के बर्तन में पानी घर के बाहर रखें। शायद कुछ पक्षी बच जाएं…

खबर पढ़ के मन ख़राब हो गया। मेरे घर में एक बड़ा सा बागीचा है। नीम के एक बड़े से पेड़ की छाँव तले मैंने अनेक पेड़-पौधे लगा रखे हैं। सैकड़ों की संख्या में पक्षी आते हैं; उनके दाने और पानी के अलग-अलग बर्तन रखें हैं, जिनमें रोज़ सुबह-शाम खाने की मचती होड़ आप देख सकते हैं इन पक्षियों के बीच। कबूतर, तोते, लुप्त-होती गौरैया, मैना, बुलबुल… और भी ऐसे पक्षी जिनके नाम मैं नहीं जानता, इस बागीचे में, खेलती-कूदती गिलहरियों के बीच, कलरव किया करते हैं। एक मज़ेदार, सुकूनदायक चहल-पहल रहती है। इस दाने-पानी का ध्यान मैं खुद ही रखता हूँ, बाकी घर-भर को भी हिदायत है कि कमी न होने पाये।

यही सोचते हुए अखबार रख कर मैं बाहर आया – भीषण धूप थी और एक भी पक्षी या गिलहरी दिखाई नहीं दे रही थी। पानी के बर्तन पर नज़र गयी, मैं थोड़ी देर उसे देखता रहा… कुछ छोटा सा लगा उस दिन मुझे वो; ख्याल आया, इस बर्तन को तो वही पक्षी देख पाते होंगे जो जानते होंगे कि पेड़ों के मध्य उसका स्थान कहाँ है… पानी ठंडा रहे, इसलिए मैंने ही उस उसे दो बड़े पौधों में बीच रख दिया था। अहसास हुआ कि फिर उन पक्षियों को जो इस चिलचिलाती गरमी में पानी ढूँढ़ते उड़ रहे होंगे… उन्हें तो यह बर्तन दिखायी नहीं देता होगा…

RRGwritesसोचते-सोचते एक विचार आया; गाड़ी निकाली और पुराने गुड़गाँव के कुम्हारों के पास जा कर, एक बड़ा सा मिट्टी का तसला ले आया। कुल-जमा सौ रुपयों का ये बर्तन इतना बड़ा और चौड़े-मुँह वाला था कि दूर गगन से साफ़ दिख जाता। पानी भरा, और उसे बीचों-बीच बगीचे में रख दिया।

आप देख सकते हैं, कैसे अब ये सिर्फ पानी पीने के ही नहीं, चिड़ियों के नहाने-भीगने के भी इस्तेमाल में आता है – मानों चिड़ियों का स्विमिंग-पूल! अब हमारे यहाँ दो पानी के बर्तन हैं, और दोनों में ही पानी पीने वाले पक्षियों की संख्याँ बढ़ गयी है। कुछ नए पक्षी भी आने लगे हैं…

और मैं, और भी खुश हूँ…

यकीन मानिये जनाब, आप को भी इन चिड़ियों का हड़-बोंग पसंद आएगा, एक अजीब सा सुकून तारी होगा…

नहीं मानते? आईये हमारे यहाँ…एक चाय आप और हम पीते हैं इस शोर और इन अठखेलियों के बीच, आप भी मान जायेंगे 🙂

कैसे होता हैं ना; हमारी दौड़ती-भागती, उलझती ज़िन्दगी कैसे कितनी छोटी-छोटी खुशियों को ढूंढ कर हमारे सामने ले आती है; बस शायद  ज़रूरत है तो थोड़ी सी करुणा की…

इन दोनों कहानियों को पढ़ कर अगर आपके चेहरे पर भी मुस्कराहट आयी हो, तो मुझे ज़रूर बताइएगा।

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Image-1 Credit: gettyimages.in

गरीबी, धर्म… और वोट

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vote-bank‘ना मो‘ और ‘रा गा’, और उनकी पार्टियों के बीच मची चुनावी खींचतान तेज़ होती जा रही है। बसपा, सपा, नितीश तो अपनी जगह हैं ही। और जब चुनाव करीब हों, तो धर्मं के ऊपर राजनीति होना इस देश का बड़ा ही पुराना दस्तूर है। इसी परंपरा के तहत हिंदुओं और मुसलमानों के हिमायती भाषणों की बाढ़ सी आयी हुयी है। जहाँ देखो वहाँ दोनों ही धर्मो के मानने वाले मतदाताओं के आर्थिक और सामाजिक पिछड़ेपन पर एक पार्टी का नेता  दूसरी पार्टी के नेतृत्व को कोसता मिल जाएगा, ये वादा साथ में करते हुए कि कैसे सिर्फ उसकी पार्टी अमुक धर्म वालों की सबसे बड़ी संरक्षक और पालक है। या कैसे किसके पास किस धर्मगुरु या किस मौलवी का समर्थन और आशीर्वाद है, वगैरह-वगैरह…

जनता – दोनो ही धर्मों को मानने वाली – हमेशा की तरह सुन रही है…

और मैं, हमेशा की तरह, कुछ स्तब्ध सा हूँ…

आज़ादी के 66 सालों के बाद भी दो मुद्दे ताज़ा हैं; हर एक पार्टी के इलेक्शन मैनिफेस्टो का हिस्सा – गरीबी-उन्मूलन और धार्मिक-भावनाएं! अब कोई इनसे पूछे कि भाई, अगर आज़ादी के इतने सालों के बाद भी गरीबी न सिर्फ जारी है, बल्कि दिन-ब-दिन बढ़ती ही जाती है, तो इन महान राजनीतिज्ञों ने कौन से कद्दू में तीर मारा अपने-अपने राज में? चुनाव-दर-चुनाव किये गए सैकड़ों ‘गरीबी-हटाओ वायदों’ के बावज़ूद अगर ‘गरीबी’ आज इतने वर्षों के उपरांत भी निरंतर पनप रही है, तो क्या लानत नहीं भेजनी चाहिए इन सरकारों पर?

और धर्म? उसके तो क्या कहने! सन 2014 में भी ये मुद्दा है!! आज भी हम में से अधिकतर लोग (वो तबका जो वोट डालने जाता है!), इसी आधार पर अपना वोट कुर्बान कर आते हैं। कुछ इस मानसिकता के साथ कि जात-भाई ना जीता, तो हम पर धिक्कार है… आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक, इत्यादि-इत्यादि विकास कार्य तो अलग मुद्दे हैं, वो सब तो चलते रहते हैं…

हिंदी भाषा के महान लेखक, रामधारी सिंह दिनकर ने एक जगह कहा है:

“संस्कृति ज़िन्दगी का एक तरीका है और ये तरीका सदियों से जमा होकर उस समाज में छाया रहता है, जिसमे हम जन्म लेते हैं।”

मैं शहरे-अवध लखनऊ की गंगा-जमुनी संस्कृति का बाशिंदा हूँ; बचपन से मेरे मित्र सभी धर्मों के थे, आज भी हैं। मिशनरी स्कूल में हिन्दू और मुस्लिम दोनों पढ़ते थे, हम अपने सिख दोस्तों के साथ गुरूद्वारे जाते और जब भी मौका मिले, बंगाली रसगुल्ले नाक डुबो-डुबो कर खाते। जब कभी हम आपसे में लड़ते-भिड़ते, वो मजहबी रंग न लेकर दो छोरो की आपसी लड़ाई मानी जाती थी। होली और ईद, दोनों पर खुश होना हमने सीखा। दीवाली पर खील-बताशों के माफ़िक ईद पर सिवईंयां मैं आज भी खोजता-लाता हूँ। मेरे लिए ये ज़िन्दगी जीने का तरीका, मेरी संस्कृति है। हमारे वालिद साहब कहा करते थे, “जो धारण करने योग्य है, वही धर्म है।” ये सीख बहुत बचपन से मेरे साथ रही। तब तो, कम-स-कम मेरे बचपन के दिनों में, हिन्दू अगले और मुस्लिम पिछड़े या मुस्लिम आगे और हिन्दू पीछे – ऐसा नहीं होता देखा मैंने।

फिर ऐसा क्यों कि आने वाले चुनावों में एक बेचैन कर देने वाली मानसिकता हमें वोट डालने आमंत्रित कर रही है? और वो काफी हद तक सफल होती भी दीखती है! क्यों?

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Image-credit: mysay.in

सचिन की सोच…

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imagesसन 1989 में मैं सिर्फ नौ साल का था जब सचिन तेंदुलकर ने खेलना शुरू किया। उन दिनों, पूरे भारतवर्ष के हरेक उम्र के बालक के जैसे ‘गली-क्रिकेट’ खेलना हमारा भी शगल था। और इसी शौक़ के चलते बारह-तेरह साल का होते-होते हर गली-मोहल्ले के बालक के समान हमने भी बड़े-बुजुर्गो की गालियों और अन्य अलंकरणों का स्वाद चख लिया था। आप भी मानेंगे कि पिछले बीस सालों में हर शहर-कस्बे-मुहल्ले के क्रिकेट-प्रेमी बालक-युवक ने ये सुरीले शब्द ज़रूर सुने होंगे – “बड़े आये खिलाड़ी! सब $@@!- सचिन तेंदुलकर बनने चले हैं..” और इसके साथ ये ताकीद कि, “जाओ-जाओ, कुछ पढ़ाई करो, सब के बस में नहीं तेंदुलकर बनना…”

अब बड़े मियाँ तो बोल के चल दिए, और हमें बड़ी ही खीज हो। काहे सचिन नहीं बन सकते हम? और फिर वो भी तो पढ़ा नहीं ठीक से; अगर उसके माँ-बाप भी उसको सिर्फ पढ़ाई में टॉप करने को बोलते और इसी तरह गरियाते, तो हम भी देखते कि भाई इत्ता बड़ा क्रिकेटर कैसे बनता। और भी ना जाने क्या ऊल-जलूल ख्याल मन में आते। अब आप तो जानते हैं कि इस उम्र में हम बालक क्या शेरदिल बाते करते हैं – “कल से खूब प्रैक्टिस करेंगे सुबह चार बजे से ही। बड़े वाले मैदान में चलेंगे सारे भाई और बहुत पसीना बहायेंगे। और फिर वो ज़ोरदार खेल दिखायेंगे कि देखते हैं अंडर-14, अंडर-16 में सिलेक्शन कैसे नहीं होगा। स्कूल-टीम में तो हमें ही खेलना है…”

….और भी न जाने क्या-क्या कच्चे-पक्के ख्याली पुलाव पकते!

अब असलियत तो हम सबके सामने है कि कौन माई-का-लाल कहाँ-कहाँ झंडे गाड़ पाया इस अंग्रेज़ी गुल्ली-डंडे के खेल में! और सचिन, अब भी सचिन है…

एक बात जो याद है मुझे और जिसने मेरे बालमन पे एक अमिट छाप छोड़ी। बचपन में सभी अंतरराष्ट्रीय टीमों के उम्दा क्रिकेटरों को खेलते देखा, सब एक से बढ़कर एक। फिर भी उनके बीच सचिन के सबसे जुदा और ऊँचे स्थान को देखते हुए एक सवाल जो मेरे मन में रह-रह कौंधता, वो था कि भई कैसे ये सचिन, सचिन है! खाता क्या है जो ये दनादन रन बनाता है? क्या राज़ क्या है भई?

इसका जवाब कई लोगो ने मुझे अलग-अलग तरीक़े से दिया, और हर जवाब कुछ ऐसा जैसे वो तो जी सब जानते हों कि अपना भाई आखिर क्या घुट्टी पीता है। अख़बार पढ़ो, तो क्रिकेट एक्सपर्ट्स के अपने अलग तकनीकी विचार थे इस बारे में… समझ न आये कि क्या सही, क्या ग़लत! और क्या मानें, क्या नहीं…

एक दिन जवाब मिला, एकदम सटीक। सचिन के गुरु श्री आचरेकर से किसी अख़बार-नवीस ने पूछा – सचिन और कांबली, दोनों आपके शिष्य हैं, दोनो को आपने सिखाया, दोनों ने एक साथ खेलना शुरू किया…क्या कारण है कि सचिन, सचिन है और कांबली अच्छा खेलने के बावज़ूद पीछे रह गया है?

गुरु आचरेकर ने सोच के जवाब दिया, कांबली क्रिकेट के अलावा भी सोचता है, सचिन सिर्फ और सिर्फ क्रिकेट के बारे में ही सोचता है…

याद पड़ता है कि मैं कुछ पंद्रह-सोलह साल का रहा हूँगा जब मैंने ये पढ़ा था। बात मन को छू गयी; गाँठ बांध ली कि भैय्या, यही मंतर है सफलता का! और जब इतने महान खिलाड़ी का गुरु ये मंतर दे, तो सही ही होगा।

सचिन जैसे बिरले ही आते हैं धरती पर, सदियों में एक बार। और मेरे बाल मन पर उसके जीवन, उसकी सोच का जो न मिटने वाला असर रहा, और रहेगा, वो मेरे बहुत काम आया। इस एक ब्रम्ह-वाक्य ने मुझे अपने जीवन में एक नयी एकाग्रता दी…

अपने सचिन को उसके शानदार खेल-जीवन की अनेक बधाई। वो सेवा-निवृत्त सिर्फ खेलने से हो रहा है, इस महान खेल से नहीं, ऐसा मेरा मन कहता है… उसे एक नयी पारी हम किसी नयी जगह, किसी नए मैदान में, इसी कौशल के साथ खेलते देखेंगे, जल्दी ही।

आपने क्या सीखा सचिन से, बताईगा।

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अगर आपको यह लेख पसंद आया, तो शायद आप सचिन और राहुल द्रविड़ पर लिखे मेरे निम्नलिखित लेख भी पढ़ना पसंद करेंगे:

Super Manoos. Waiting For The Next Ball…

The Wall. Retires…

Photo-credit: cricketinnings.com 

आओ, हम कुछ बदलें…

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Dilli

आज बड़े दिनों के बाद एक पुराने मित्र से बात हुयी। हम बचपन में साथ में पढ़ते थे। बाहरवीं के बाद वो देश से बाहर चला गया, पढ़ाई पूरी की, वहीं नौकरी कर ली। देश आता-जाता रहा, पर पिछले 15 सालों से दिल्ली में समय नहीं बिताया। बस, अभी कुछ दिन हुए, अपनी कंपनी के एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में एक साल के लिए दिल्ली आया है।

उसने दुनिया घूमी है, और कुछ तीन महीनों से दिल्ली में रहता है। खूब बातें हुयीं, कई पुरानी यादें ताज़ा हुयी। कुछ यूँही ख्याल आया, मैं पूछ बैठा, “अमां यार, बड़ी दुनिया घूम आये, कई छोटे-बड़े शहर देख डाले तुमने। ये तो बताओ कि दिल्ली कैसी लगी?”

“अच्छी है, भाई, बहुत बढ़िया। जो सुनते थे, उससे बेहतर ही है कुछ मायनों में”, उसने कहा।

“तो फिर ये कहो कि वो क्या पांच चीज़ें बदल जाएँ यहाँ तो ये शहर दुनिया के उम्दातरीन शहरों में शामिल हो जायेगा?”, मैंने कुरेदा।

जो जवाब दिया उसने, वो आप सब से बाँटना चाहता हूँ:

  1. राह-चलती महिलाओं को इतना तो मत घूरो यार; ये तो यहाँ बहुत ही ज्यादा होता है!

  2. रेड-लाइट होने पर लोग-बाग़ रुकने लगें, तो जान-में-जान आये।

  3. तुम लोग अपने कार, स्कूटर-मोटरसाइकिल चलाते हुये या उनमे बैठे हुए दूसरी गाड़ियों के अन्दर क्यों झांकते रहते हो?

  4. डस्टबिन न मिले तो टॉफ़ी, पान-मसाला खा के रैपर जेब में रख लो; सड़क पर तो न फेंको।

  5. ऑटो वाले मीटर से चलने लगें, तो क्या बात है! और कृपा कर के कहीं जाने के लिए सवारी को मना तो न करें।

फिर वो बोला, “यार, कमियाँ तो सब देशों और शहरों में हैं; पर हमें तो अपने आस-पास को बेहतर बनाने के बारे में सोचना, करना चाहिए, नहीं?”

फ़ोन रखने के बाद मैंने सोचा, क्या सही बात है। ये वो आदमी है जो सिर्फ तीन-चार महीनो से यहाँ पर है, ये सब महसूस और देख चुका है; और दिल्ली के इस स्वरुप के बारे में चिंतित है। नहीं कह सकता कि इन पांच बदलावों में ऐसा क्या है जो हम दिल्लीवाले नहीं जानते, या अपने घरों में बैठे हुए इनके बारें में शिकायत नहीं करते। शायद रोज़ ही घरों और दफ्तरों में हम इस बारें में बातें किया करतें हैं। पता नहीं क्यों, फिर भी ये पाँचों चीज़े ठीक नहीं होती हमारे आस-पास…

इस उम्मीद में आपसे साझा कर रहा हूँ कि आप खुद भी सोचेंगे और अपने करीबियों को भी बतायेंगे। कुछ तो बदलेगा, ये विश्वास है…

आप दिल्ली में ऐसा क्या बदलना चाहेंगे, जो आपके-मेरे हाथ में है?

Written by RRGwrites

August 25, 2013 at 7:03 PM

लखनवियत…

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आज नवभारत टाइम्स अखबार में ब्रजेश शुक्ल का लेख पढ़ा – “इस लखनवियत पर पूरी दुनिया कुर्बान” – मज़ा आ गया। और याद आया वो जुमला, जो हमारे वालिद साहब कहा करते थे –

‘लखनऊ की नज़ाकत है, कि रसगुल्ले भी छील के खाए जाते हैं।’

बड़ी ही इच्छा है कि आप लोग भी इस लेख को पढ़ें। इस अंग्रेज़-दां ज़माने में शायद आप में से हिंदी का अखबार घर मँगाने और पढ़ने वाले कम ही होंगे, इसलिए मैं इस लेख को साभार प्रस्तुत कर रहा हूँ –

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इस लखनवियत पर पूरी दुनिया कुर्बान
बृजेश शुक्ल।।

नवभारत टाइम्स | Aug 13, 2013

‘पहले आप! कहने की ताब वही ला पाते हैं जिनमे औरों को खुद से आगे रखने की सभ्यता हो

पुराने लखनऊ में मेरे एक दोस्त रहते हैं। एक दिन अपना घर दिखाने लगे और मुस्कराकर बोले- यहां से वहां तक आपका ही घर है। लखनवी तहजीब, नफासत, नजाकत, इलमी अदब, वजादारी, मेहमानवाजी, हाजिर जवाबी में लखनऊ का दुनिया में कोई जोड़ नहीं। पिछले तीस सालों में लखनऊ कहां से कहां तक तरतीब और बेतरतीब ढंग से बढ़ा, उससे यह सवाल जरूर उठा कि लखनवियत अब बचेगी या नहीं। लेकिन टुकड़ों में ही सही, लखनवियत आज भी जिंदा है। विकास की अंधी दौड़ में समाज का बड़ा वर्ग ‘पहले आप! पहले आप!’ की तहजीब को भी नहीं समझ पाया। कुछ लोगों के लिए यह शब्द मजाक का विषय भी बना। लेकिन यकीन मानिए, ‘पहले आप! पहले आप!’ तो उसी महान संस्कृति के लोग कह सकते हैं, जिसमें कुर्बानी का जज्बा हो, जिसमें मेहमाननवाजी और दूसरों को तरजीह देने की कूवत हो। जो पहले खुद के लिए परेशान है, वह पहले आप बोल ही नहीं सकता।

नवाब आसफुद्दौला

लखनवियत लखनऊ के रस्मोरिवाज में घुली-मिली है। रमजान के दिनों में आप देर रात पुराने लखनऊ की गलियों में घूमिए। चाय की दुकानों में सामने रखे चाय के प्याले की ओर इशारा करते हुए यह कहने वाले आपको बहुत से लोग मिलेंगे- नहीं-नहीं, पहले आप लीजिए। लखनऊ में सन् 1722 में नवाबों का शासन आया और 1857 तक चला। लेकिन लखनवियत पनपी और बढ़ी 1775 से, यानी नवाब आसफुद्दौला के शासनकाल से। नवाब वाजिद अली शाह के समय में तो इस तरह फली-फूली कि लोग इस पर कुर्बान हो गए। वास्तव में लखनवियत तीन बुनियादी मूल्यों पर आधारित है। पहला इंसानियत, दूसरा हक यानी किसी जाति-धर्म का व्यक्ति हो, उसके साथ किसी तरह का भेदभाव न हो। तीसरा बिंदु है धर्मनिरपेक्षता- हर मजहब और मिल्लत की इज्जत करना और उसकी बेहतर चीजों को अपनाना। यहां बहुत से हिंदू एक दिन का रोजा रखते है। मोहर्रम के दिनों में तमाम हिंदू महिलाएं इमामबाड़े व ताजिये के सामने जाकर मन्नतें मांगती हैं। जी हां, आज भी।

जोगिया मेला और इंदरसभा

‘काजमैन रौजा’ लाला जगन्नाथ ने बनवाया था। नवाब आसफुद्दौला के वजीर झाऊलाल ने ठाकुरगंज में इमामबाड़ा और टिकैतराय ने एक मस्जिद बनवाई। अमीनाबाद में पंडिताइन की मस्जिद मशहूर है। अलीगंज के हनुमान मंदिर के शिखर पर चमकने वाला इस्लामी चिन्ह चांद-तारा लखनवियत का प्रतीक है। इस मंदिर की संगेबुनियाद नवाब शुजाउद्दौला की बेगम और नवाब आसफुद्दौला की वालिदा बहूबेगम ने रखी थी। इस आपसी भाईचारे के कारण ही लखनऊ में अमन-चैन रहा। एक बार नवाब आसफुद्दौला का पड़ाव अयोध्या में पड़ा। नवाब साहब को जब तोपों की सलामी दी जा रही थी तभी उनके कानों में घंटा-घड़ियाल की आवाजें पड़ी। नवाब ने हुक्म दिया कि उनका पड़ाव इस पवित्र नगरी से पांच मील दूर डाला जाए, ताकि हिंदुओं को पूजा-पाठ में कोई व्यवधान न पैदा हो। नवाब वाजिद अली शाह हर साल जोगिया मेला लगवाते थे। उन्होंने राधा-कन्हैया और इंदरसभा नाटक लिखे और स्वयं श्रीकृष्ण की भूमिका करते थे।

तबला, खयाल, ठुमरी, सितार की परवरिश लखनऊ में हुई। कथक ने यही जन्म लिया। आदाब लखनवियत का हिस्सा है। जरा नवाबों की सोच तो देखिए। हिंदू नमस्ते कहे, मुसलमान सलाम करे तो एकता के दर्शन कहां। नवाबों ने दोनों वर्गो के लिए आदाब दिया। नजरें और सर थोड़ा झुका हुआ। उंगलियां आगे की ओर झुकी हुईं और हाथ को नीचे से थोड़ा ऊपर ले जाकर धीरे से आदाब कहना। इस लखनवियत में अहंकार नहीं है, संपन्नता का गरूर नहीं है। इस तहजीब की सबसे बड़ी खासियत यही है कि जुबान और व्यवहार से किसी को कष्ट न पहुंचे। कोई बीमार है तो यह नहीं पूछा जायेगा कि सुना आप बीमार है। पूछने वाला यही कह कर बीमार का हाल जान लेगा कि सुना है हुजूर के दुश्मनों की तबीयत नासाज है। लखनवी जुबान उर्दू है। लेकिन बहुत रस में पकी हुई, शहद में डूबी हुई। मुगलिया सल्तनत की जुबान फारसी थी। लेकिन उर्दू दक्षिण में पैदा हुई, दिल्ली में जवान हुई, लखनऊ में दुल्हन बनी और शबाब पाया।

वक्त बदल गया है। दीवारों से लखौरी ईटें गायब हो रही है। इमारतों का आर्किटेक्चर बदल रहा है। लेकिन पुराने लखनऊ की गलियों में आज भी लखनवियत नजर आती है। काजमैन के पास किसी बात को लेकर दो गुटों में तनाव हो गया। पत्रकार पहुंचे तो उन्होंने जानकारी चाही। वहां खड़े एक युवक ने बड़े मीठे लहजे में बताया- जनाब उधर शिया हजरात रहते हैं, इधर अहले सुन्नत हजरात रहते हैं। पत्रकारों ने समझा कि कोई मुस्लिम युवक है, इसी से बात कर ली जाए। नाम पूछा तो पता चला कि वह हिंदू था। लखनऊ की नजाकत, नफासत और मीठी जबान धर्म के आधार पर नहीं बंटी। यह तो एक तहजीब है। लखनऊ की हवाओं में लखनवियत है। गालियों से लेकर मोहब्बत व छेड़खानी तक का अपना अंदाज है। इस तहजीब को जीवन में उतार चुके लोगों की लड़ाइयों का भी तर्जे बयां निराला है- ‘अब आप एक लफ्ज भी न बोलिएगा, बाखुदा आपकी शान में गुस्ताखी कर दूंगा।’ जवाब आएगा- ‘चलो मैं नहीं बोलता अब आप फरमाइए।’

दुनिया में लाजवाब है तू

अब जीवन तेज गति से चल रहा है। किसी के पास समय नहीं बचा। शब्दों में हाय-हलो हावी हो गया है। लेकिन लखनऊ के मामलों पर गहरी जानकारी रखने वाले जाफर अब्दुल्ला कहते हैं- लखनवी जुबान तो हवा का वो झोंका है जो जीवन में रंग भर देता है। दुनिया के किसी भी कोने में यदि आपको अपनी बेगम को ही आप कहने वाले कोई साहब मिल जाएं तो उनसे जरूर पूछिएगा, जनाब क्या आप लखनऊ के हैं? लखनऊ के ही प्रसिद्ध लेखक और इतिहासविद् योगेश प्रवीन की ये लाइनें लखनवियत को बताने के लिए काफी हैं-

ये सच है जिंदादिली की कोई किताब है तू।
अदब का हुस्नो-हुनर का हसीं शबाब है तू।
सरे चमन तेरा जलवा है वो गुलाब है तू।
लखनऊ आज भी दुनिया में लाजवाब है तू।

(http://navbharattimes.indiatimes.com/thoughts-platform/viewpoint/lucknow-and-its-culture/articleshow/21779349.cms)

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शुक्लजी, बहुत शुक्रिया इस लेख के लिए…अब आपने लखनवियत की बात की है तो कहीं बहुत पुराना पढ़ा एक शेर याद आया लखनऊ के शुक्रगुज़ार होने पर –

‘मुमकिन नहीं कि कर सकूं मैं शुक्रिया अदा
लेकिन शुक्रगुज़ार हमेशा रहूँगा मैं’

Lucknow

Written by RRGwrites

August 13, 2013 at 11:54 AM

सफलता का मंत्र

with one comment

N Shivakumar IIM Newspaper Vendorअभी कुछ देर पहले NDTV पर ‘हम लोग’ कार्यक्रम देखा। कुछ ऐसा अनुभव हुआ जो आपसे बाँटना चाहता हूँ। अनुभवी पत्रकार रवीश कुमार ने मंच पर तीन मेधावी छात्रों – निरीश राजपूत, कोमल गणात्रा और एन. शिवा कुमार – को आमंत्रित किया था जिन्होंने समाज में निचले तबके से होने के बावज़ूद और अनेक मुश्किलों को पार करते हुए, अपनी मेहनत और लगन से, अपने मजबूर इरादे से इस साल भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) और भारतीय प्रबंधन संस्थान (IIM) में स्थान अर्जित किये हैं।

इस एक घंटे के कार्यक्रम में कई अच्छी बातें सुनी और देखी; कैसे एक छोटे से कस्बे का एक गरीब लड़का दोस्तों की मदद से अपनी पढ़ाई करता है और IAS में चयनित होता है; एक युवती, जिसे उसके दहेज़-लोभी ससुराल वाले घर से निकाल देते हैं, वो सामाजिक बहिष्कार से लड़ते हुये प्रशासनिक सेवा का इम्तिहान देती है और सफल होती है। और कैसे एक अख़बार बाँटने वाला युवक देश के सबसे प्रतिष्ठित प्रबंधन संस्थान IIM में पढ़ने का अपना अटूट इरादा पूर्ण करता है। उनके दमकते चेहरे देख के एक अजीब सी ख़ुशी हुयी, मानों मैंने खुद ही कुछ हासिल किया हो…

एक बात जो मन को छू गयी, वो आप को बताना चाहता हूँ। बैंगलोर के शिवा कुमार, जो कि पिछले दस-पन्द्रह सालों से, अपने स्कूल के दिनों से अख़बार बांटते हैं, आज अपने अनुभव साझा कर रहे थे। अनपढ़ माँ और कर्ज़ के बोझ से लदे ट्रक-ड्राइवर पिता का ये लाल अपने पूरे बचपन और युवावस्था के दौरान रोज़ सुबह 4 बजे उठ कर अख़बार डालता रहा; और अपने काम में इतना बेहतर हुआ कि न्यूज़-पेपर वेंडर बना; एक करुण और दयावान ग्राहक की मदद से अपनी पढ़ाई पूरी करी, इंजीनियर बना और अब IIM कलकत्ता पढ़ने जा रहा है।

रवीश ने शिवा से पूछा कि आखिरी बार उसने अख़बार कब बांटें थे। सहजता से उत्तर आया, “कल ही; यहाँ आने से पहले”। तालियों की गड़गड़ाहट से अविचलित उसने और आगे कहा, “मैं इस काम की वजह से आज आगे आया और यहाँ तक पहुंचा हूँ, भला उसे कैसे छोड़ता…”

कितनी उत्तम बात है, और कितनी ईमानदारी से कही गयी है…

मुझसे बहुत से लोग ये कई बार पूछते हैं कि सफलता का मंत्र क्या है। मैं समझता हूँ कि शिवा कुमार ने अपनी बात से बड़ी ही सरलता से इस प्रश्न का उत्तर दे दिया – सफलता का मंत्र अपने काम से ईमानदारी बरतने में है। जो व्यक्ति उन्नति के रास्ते पर बढ़ते हुए अपने आप को अपने काम से बड़ा समझने लगे, वो कुछ समय तक सफल तो हो सकता है, सार्थक नहीं बन सकता।

उम्मीद है कि आज के छात्र और कामकाज़ी लोग इस बात का महत्व समझेंगे। अब अपने अनुभव बाँटनें की आपकी बारी है; आप क्या सोचते हैं, बताईयेगा।

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Photo-credit: ibnlive.in.com

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