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Archive for the ‘Life’ Category

भीड़…

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कल डेरा-समर्थकों का उपद्रव पूरे देश ने देखा। हरिशंकर परसाई ने लिखा था, “भीड़ का हृदय होता है, मस्तिष्क नहीं”। मुझे लगा कि कल हमने यह वचन सार्थक होता देखा। मैं गुरु, क़ानून, शासन – किसने क्या किया या नहीं किया, इसमें नहीं जाना चाहता। दुःख इस बात का कि इस मस्तिष्कहीन भीड़ में इस देश का दिग्भ्रमित युवा ही था, हर पत्थरबाज़ भीड़ में होता है – कश्मीर से पंचकुला तक।

परसाई ने लिखा था, “दिशाहीन, बेकार, हताश, नकारवादी, विध्वंसवादी बेकार युवकों की यह भीड़ खतरनाक होती है. इसका उपयोग खतरनाक विचारधारा वाले व्यक्ति और समूह कर सकते हैं. इस भीड़ का उपयोग नेपोलियन, हिटलर और मुसोलिनी ने किया. यह भीड़ धार्मिक उन्मादियों के पीछे चलने लगती है. यह भीड़ किसी भी ऐसे संगठन के साथ हो सकती है जो उन्माद और तनाव पैदा कर दे. फिर इस भीड़ से विध्वंसक काम कराए जा सकते हैं. यह भीड़ फासिस्टों का हथियार बन सकती है. हमारे देश में यह भीड़ बढ़ रही है. इसका उपयोग भी हो रहा है. आगे इस भीड़ का उपयोग सारे राष्ट्रीय और मानव मूल्यों के विनाश के लिए, लोकतंत्र के नाश के लिए करवाया जा सकता है।”

कल यही नाश हमने देखा…

अमर युवा-शहीद सरदार भगत सिंह अपने एक लेख में युवावर्ग के बारे में लिखा था:

“16 से 25 वर्ष तक हाड़-चर्म के इस संदूक में विधाता संसार भर के हाहाकारों को समेट कर भर देता है…
युवावस्था में मनुष्य के लिए दो ही मार्ग हैं –
वह चढ़ सकता है उन्नति के सर्वोच्च शिखर पर;
वह गिर सकता है अध:पतन के अँधेरे खन्दक में।
चाहे तो त्यागी बन सकता है युवक, चाहे तो विलासी;
वह देवता बन सकता है तो पिशाच भी…”

इन गुरु-अंधभक्त पिशाचों को भगत सिंह की यह बात समझे, ऐसी उम्मीद करता हूँ…

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Written by RRGwrites

August 26, 2017 at 9:54 AM

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This New Year, Let’s Find God Within Us All…

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imageFifteen long years ago, around the same year-end time, I had read this heart-touching story. I was deeply moved; and as a habit, noted it down in my diary. As a young lad, this story left a deep impression upon me at the time and since then, I start my each new year reminiscing it.

This year, as all of us get ready to usher the new year in, I am sharing this piece with you: 

One cold evening during the holiday season, a little boy about six or seven was standing out in front of a store window. The little child had no shoes and his clothes were mere rags. A young woman passing by saw the little boy and could read the longing in his pale blue eyes. She took the child by the hand and led him into the store. There she bought him some new shoes and a complete suit of warm clothing.

They came back outside into the street and the woman said to the child, “Now, you can go and have a very happy holiday.”

The little boy looked up at her and asked, “Are you God, Ma’am?”

She smiled at him and replied, “No, son. I am just one of His children.”

The little boy then said, “I knew you had to be some relation.”

Touching, isn’t it? This story helped me stay more human year on year, welcoming the new year on a nicer note… I wish you all a very happy new year 2017; hope that you find your reasons and means to show you are the chosen one by the Lord Almighty to play His children, same way as the young lady in the story.

God bless you all…

Written by RRGwrites

December 30, 2016 at 7:45 PM

That Tree Still Shakes Delhi…

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Circa 1984.

“Some riots took place in the country following the murder of Indiraji. We know the people were very angry and for a few days it seemed that India had been shaken. But, when a might tree falls, it is only natural that the earth around it does shake a little.”

 – Rajeev Gandhi; 19 November 1984, Prime Minister designate

Circa 2005.

“I have no hesitation in apologizing not only to the Sikh community but the whole Indian nation because what took place is the negotiation of the concept of nationhood, as enshrined in our Constitution. On behalf of our government, on behalf of the entire people of this country, I bow my head in shame that such a thing took place.”

– Dr. Manmohan Singh; 11 August 2005, the then Prime Minister, served India till year 2014

It is 2016 now.

That same tree continues to haunt the streets of Delhi and no apology from anyone whatsoever has helped the cause of justice as yet.

As the seekers of justice gather today and lament the delay in justice in the matter of over 3000 citizens of a minority community massacred over three days in 1984 in broad daylight on the roads of Delhi, I am deeply anguished and saddened to wake up to a morning 32 years later from the day this ghastly event manifested in the most barefaced manner on the streets of Delhi.

Well, didn’t someone say justice delayed is justice denied? May be, the phrase wasn’t meant for the commoners in India…

Authors Manoj Mitta and HS Phoolka, the tireless warriors for justice in the matter and conceivably the most knowledgeable people on this case, wrote in their well-researched book, ‘When A Tree Shook Delhi: The 1984 Carnage and its Aftermath’:

“Whichever way you look at India, whether as the world’s largest democracy, or as one of the fastest growing economies in the world, it is hard to imagine that any genocide could have taken place a few years ago right in its capital.”

Well, it did happen. And it is no solace that the masterminds and perpetrators of this rather well organized crime roam so freely, to date.

How I wish the apology of our last Prime Minister translated into actions. To a commoner like me, that would have been far more reassuring.

Not to be, as yet. The fight is on…

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Disclaimer: The views expressed above are author’s own and not of the organisation he is associated with.

रावण की कुदृष्टि…

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Written by RRGwrites

October 11, 2016 at 10:20 AM

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शहीदों के विचार…

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bhagat_singh_1929_140x190आज शहीद सरदार भगत सिंह का 110वां जन्मदिवस है – एक तरीक़े से, आज शहीद उत्सव है।

मैं आपसे शहीद भगत सिंह का उनके अंतिम समय का एक कथन
बाँटना चाहता हूँ; ना जाने क्यों आज मुझे यह बहुत याद आ रहा है –

“ऊषा काल के दीपक की लौ की भांति बुझा चाहता हूँ। इससे क्या हानि है जो ये मुट्ठी भर राख विनष्ट की जाती है। मेरे विचार विद्युत की भांति आलोकित होते रहेंगे…”

कितना गंभीर और निश्छल, परन्तु सत्य वचन है; और इतिहास इस बात का साक्षी है कि उनके विचार आज भी हमें आलोकित करते है…

आईये, आज सोचें कि क्या हमारे आचरण में, विचारों में इतना तेज है कि वो हमारे जाने के बाद भी याद किये जायेंगे और लोग उनका अनुसरण करेंगे?

Written by RRGwrites

September 27, 2016 at 11:01 AM

Musings of a Mommy

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Notes of a young mother.

someneha

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Life for a mother on a career break is an emotional rollercoaster. There are moments which make you burst with joy and there are others which make you want to scratch your face with your own nails.

I stopped working partially just before my son was born and completely so, a few months later. As much as I took the decision to be with Rajvir full time, absolutely convinced, I cried the day I came back from work letting my bosses know. I cried the day they told me about my final day of work and I cried on my final day of work. I didn’t shed a tear after that. None of those tears were for my workplace or my colleagues or my role, it was for pausing in the middle of my passion, something that is only mine, my work and the satisfaction I got after every successful…

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Written by RRGwrites

April 9, 2016 at 1:22 AM

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मेरा हिमालय और उसका क़ब्रिस्तान

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मैं पिछले कई वर्षों से बद्रीनाथ यात्रा पर जाता हूँ। एक भक्त के रूप में नहीं, एक बाइकर के रूप में। हिमालय मेरा आँगन रहा है बालमन से और जब-जब मैं अपनी रॉयल एनफ़ील्ड मोटरसाइकिल ले कर बद्रीनाथ गया, वही पहाड़ और वही पहाड़ी रास्ते मेरे लिए पूज्य और देव-तुल्य रहे, किसी भी मंदिर से ज़्यादा।

हाल के सालों में – 2012 और 2015 – ये दो यात्रायें की बाबा बद्रीनाथ के द्वार को। आप कह सकते हैं – ज़लज़ला आने के पहले वाले साल और उसके दो साल बाद। जो देखा, और महसूस किया, वो शब्दों में बयां नहीं कर सकता। सड़कें तो बन गयीं हैं, पहले से बेहतर भी है। पर सड़को से नीचे उतर कर देखो, तो पहले और बाद का भयावह फ़र्क़ पता चलता है।

इसलिए, 2012 की यात्रा का वर्णन तो आप मोटरसाइकिल डायरीज में यहाँ पढ़ सकते हैं, पर 2015 की यात्रा के बारे में लिख पाऊँ, वो शब्द और हिम्मत अब तक नहीं जुटा पाया हूँ।

Himalaya ka Kabristanकुछ दिन पहले दैनिक भास्कर अख़बार में जयप्रकाश चौकसे साहब के लेख में एक किताब का वर्णन पढ़ा – ‘हिमालय का क़ब्रिस्तान’– ये शीर्षक है प्रत्रकार लक्ष्मी प्रसाद पंत की इस पुस्तक का। पिछले दो दिन में ये किताब पढ़ी। केदारनाथ-काश्मीर-काठमाण्डू – तीनो जगहों की हिमालय-उपजित त्रासदी के बारे में एक निर्भीक पुस्तक।

अगर आप भी मेरे जैसे हिमालय से सच्चा प्रेम करते हैं – और न सिर्फ इसे पूजते हों और न सिर्फ इसे छुट्टी बिताने का मनोरम पर्यटन स्थल समझते हों – तो इस पुस्तक को पढ़ने की सलाह मैं आपको दूँगा।

इस किताब को पढ़ने के बाद मुझे एक बात याद आती है। 2012 की मोटरसाइकिल यात्रा के दौरान मेरा छोटा भाई नितिन भी साथ था – अपनी पहली लंबी मोटरसाइकिल यात्रा पर और पहली बार पहाड़ पर। ज़ाहिर तौर पर उत्सुकता ज़्यादा थी और सवाल भी। मैं हिमालय के बारे में जानता-पढ़ता रहता हूँ और सामाजिक-भौगोलिक जानकारियां रखता हूँ, एक आम पर्यटक से ज़्यादा। जब हम बद्रीनाथ पहुंचे तो अगली यात्रा केदारनाथ की हो, ऐसी बात होने लगी। बद्रीनाथ मंदिर के ठीक नीचे अपनी पूरी शान से बहती अलकनंदा के बारे में बात करते हुए मैंने नितिन को केदारनाथ के साथ बहती मन्दाकिनी नदी के बारे में बताया। ये भी कि कैसे पहले मन्दाकिनी नदी दो धाराओं में बहती थी – पूर्वी और पश्चिमी। और कैसे समय के साथ अब सिर्फ एक धारा में ही प्रवाहित होने लगी है। नितिन ने पूछा कि दूसरी तरफ क्या है अब? मुझे जवाब मालूम नहीं था, सो बात वही ख़त्म हो गयी।

मैं आपको बता दूँ कि जब अगले ही साल 2013 में सैलाब आया, तो मन्दाकिनी नदी ने सारे बंधन तोड़ दिए और दुसरे पुराने रास्ते से भी बह निकली – और उसे रास्ते में मिले घर, दुकान, होटल और न जाने क्या-क्या – अपने रास्ते में उसे मनुष्य का किया अतिक्रमण मिला। और वो उसे बहा ले गयी… पंत जी अपनी पुस्तक के बारे में इस बारे में विस्तार से लिखते हैं… उसे पढ़कर मेरी आँखे भर आईं और भाई से हुयी बात याद हो आयी।

अंग्रेजी उपन्यासकार कजाओ इशीगोरो के हवाले से लेखक ने लिखा है:

“जैसे शतरंज के खेल में जब तक हम अपनी चाल के ऊपर से ऊँगली नहीं उठाते, हमें अपनी ग़लती का अहसास नहीं होता, वैसे ही प्राकृतिक आपदाओं का अहसास भी अचानक ही होता है जब हमारी गलतियाँ अति कर देती हैं।”

2012 में मेरे पास इस प्रश्न का उत्तर नहीं था कि मन्दाकिनी के दूसरे रास्ते में क्या है। 2013 के बाद से मेरे पास इस प्रश्न का उत्तर नहीं है कि क्यों प्रशासन आंखें मूंदे रहा इतने वर्षों से लगातार फैलते अतिक्रमण पर। हमने नदी के रास्ते में अपना घर बनाया और अब दोष नदी को, कि उसने अपना वही रास्ता वापस चुन लिया, तो वो दैवी आपदा है?

मैं लेखक से पूर्णतया सहमत हूँ कि यह कोई दैवी आपदा नहीं थी। ना उत्तराखण्ड में, ना ही कश्मीर और नेपाल में। ये मनुष्य के लालच का परिणाम हैं, जिसे हम दैवी आपदा और हिमालय का प्रकोप और न जाने और क्या-क्या नाम देते हैं।

2016 – मैं फिर से तैयार हूँ मई माह में बद्रीनाथ जाने को। इस बार मेरी और नेहा की माएं भी साथ जा रहीं हैं। वो 2013 में नहीं जा पाईं थी – वही साल जब सब जल-मग्न  हो गया था। परिवार ने तब चैन की सांस ली थी कि वो दोनों उस साल चार-धाम यात्रा पर नहीं जा पाईं। वो चैन की सांस जो हज़ारों-लाखों परिवार नहीं ले पाए। हिमालय मुझे फिर बुला रहा है और मैं इस बार कुछ डरता हुआ सा, पहली बार ऐसा महसूस करते, जा रहा हूँ।

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