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देनहार कोई और है…

with one comment

मुश्किल वक़्त चल रहा है और बहुत से सक्षम लोग बहुतों की मदद कर रहे हैं। अच्छा है। पर किसी के कुछ भी देते हुए उसकी तस्वीर खींच कर उसे दुनिया भर में फैला देना और अपनी दानवीरता का ढिंढोरा पीटना – कुछ जमता नहीं। ऐसे समय हाथ बढ़ा कर मदद लेने वालों को शर्मिंन्दा हो नज़रे झुकाते, ऐसा मैंने कई बार देखा।
कहीं पढ़ी एक कहानी याद आती है जिसके बारे में कहते हैं कि यह महाकवि रहीम और गोस्वामी तुलसीदास का आपसी संवाद था। रहीम साहब की यह आदत थी कि जब वो दान देने के लिए हाथ बढ़ाते तो अपनी नज़रें नीचे झुका लेते थे। यह बात सभी को अजीब लगती कि ये कैसे दानवीर हैं कि दान भी देते हैं और इन्हें ऐसा करते हुए लज्जा भी आती है। जब तुलसीदास को इस बात की जानकारी मिली तो उन्होंने यह पंक्तियां लिख भेजीं:
“ऐसी देनी देन जु, कित सीखे हो सेन।
ज्यों-ज्यों कर ऊँचौ करो, त्यों-त्यों नीचे नैन।।”
(हे मित्र, तुम ऐसे दान क्यों देते हो? ऐसा तुमने कहाँ से सीखा? (मैंने सुना है कि) जैसे-जैसे तुम अपने हाथ दान करने के लिये उठाते हो, वैसे-वैसे अपनी आँखें नीची कर लेते हो।)
बाबा रहीम ने जवाब लिखा:
“देनहार कोई और है, देवत है दिन रैन।
लोग भरम हम पर करें, याते नीचे नैन॥”
(देने वाला तो कोई और, यानी ईश्वर है, जो दिन रात दे रहा है। लेकिन लोग समझते हैं कि मैं दे रहा हूँ, इसलिये मेरी आँखें अनायास ही शर्म से झुक जाती हैं।।”
नहीं जानता कि कहानी कहाँ तक सच है, पर उसका मर्म एकदम ठीक है। ज़ुबैर रिज़वी ने कहा है – “पुराने लोग दरियाओं में नेकी डाल आते थे; हमारे दौर का इंसान नेकी कर के चीख़ेगा”। बात सोचने योग्य है…

Written by RRGwrites

May 30, 2020 at 1:02 PM

Posted in Life

One Response

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  1. सही मायने में देनहार कोई और ही है।

    Vivek

    August 3, 2020 at 5:38 PM


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