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लखनऊ की नज़ाकत…

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आज दफ़्तर में कुछ उम्दा ज़ायक़ों और उसके शौकीनों पर बात हो रही थी; और जब लज़ीज़ खाने-खिलाने की बात हो तो शहरे-लखनऊ का ज़िक्र लाज़मी है।और जब लखनऊ की बात हो तो तहज़ीब और सलीक़े की बात ख़ुद-ब-ख़ुद आ जाती है। एक आपबीती याद आ गयी जो कुछ सालों पहले की है। शायद मेरे मित्र अखिल दवे को ये घटना याद हो। क़िस्सा कुछ यूँ है कि अखिल और हम लखनऊ में थे और देर रात चौक की तरफ़ ठंडाई पीने पहुँचे – तिवारी जी की प्रसिद्ध दुकान आधी रात भी गुलज़ार थी। हुआ कुछ यूँ कि हमें उस रोज़ ठंडाई कुछ ख़ास पसंद नहीं आयी और ना चाहते हुए भी हमने बहुत थोड़ी सी गिलास में छोड़ दी। यह देख दुकान पर खड़े शख़्स ने ख़ालिस लखनवी लहजे में दरयाफ़्त किया, “क्यों जनाब, क्या आज ठंडाई पसंद नहीं आयी?” हमने जवाब दिया, “नहीं साहब, आज कुछ ऐसा मालूम होता है कि अपने मुँह का स्वाद ही ठीक नहीं है; आपकी ठंडाई तो बहुत उम्दा बनी है।” इस पर दुकानदार ने वो जवाब दिया जिसने लखनऊ की जगप्रसिद्ध मीठी ज़बान और क़ायदे को साबित कर दिया; “क्या बात करते हैं आप भी! भला आपके मुँह का स्वाद क्यूँकर ख़राब होने लगा, शायद आज कुछ ठंडाई ही ठीक नहीं बनी होगी।” और यह कह कर मेरे पुरज़ोर इसरार के बावजूद पैसे लेने से इंकार कर दिया।

बम्बई शहर के निवासी अखिल को यह बातचीत सुन हैरान होते देख मैं मुस्कुरा उठा – इसे ही लख़नवियत कहते हैं – जहाँ सामान बेचने और ख़रीदने वाले दोनो लोग एक दूसरे के पक्ष में खड़े दिखें और अपने को पीछे रख दूसरे का मान रखने को तैयार हों। जैसा कि नवाब ज़फ़र मीर अब्दुल्ला साहब कहते हैं – “ज़बान जो है, वो ज़ायक़े की अलामत है”।

जब मैं यह क़िस्सा सुना रहा था तो सुनने वाले हतप्रभ थे – मानो पूछना चाहते हों कि कहीं ऐसा भी होता है भला!
आएँ हमारे लखनऊ में, ऐसा बहुत कुछ आज भी होता है 😊

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Written by RRGwrites

May 13, 2019 at 10:54 PM

Posted in Life

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