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Archive for March 2016

मेरा हिमालय और उसका क़ब्रिस्तान

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मैं पिछले कई वर्षों से बद्रीनाथ यात्रा पर जाता हूँ। एक भक्त के रूप में नहीं, एक बाइकर के रूप में। हिमालय मेरा आँगन रहा है बालमन से और जब-जब मैं अपनी रॉयल एनफ़ील्ड मोटरसाइकिल ले कर बद्रीनाथ गया, वही पहाड़ और वही पहाड़ी रास्ते मेरे लिए पूज्य और देव-तुल्य रहे, किसी भी मंदिर से ज़्यादा।

हाल के सालों में – 2012 और 2015 – ये दो यात्रायें की बाबा बद्रीनाथ के द्वार को। आप कह सकते हैं – ज़लज़ला आने के पहले वाले साल और उसके दो साल बाद। जो देखा, और महसूस किया, वो शब्दों में बयां नहीं कर सकता। सड़कें तो बन गयीं हैं, पहले से बेहतर भी है। पर सड़को से नीचे उतर कर देखो, तो पहले और बाद का भयावह फ़र्क़ पता चलता है।

इसलिए, 2012 की यात्रा का वर्णन तो आप मोटरसाइकिल डायरीज में यहाँ पढ़ सकते हैं, पर 2015 की यात्रा के बारे में लिख पाऊँ, वो शब्द और हिम्मत अब तक नहीं जुटा पाया हूँ।

Himalaya ka Kabristanकुछ दिन पहले दैनिक भास्कर अख़बार में जयप्रकाश चौकसे साहब के लेख में एक किताब का वर्णन पढ़ा – ‘हिमालय का क़ब्रिस्तान’– ये शीर्षक है प्रत्रकार लक्ष्मी प्रसाद पंत की इस पुस्तक का। पिछले दो दिन में ये किताब पढ़ी। केदारनाथ-काश्मीर-काठमाण्डू – तीनो जगहों की हिमालय-उपजित त्रासदी के बारे में एक निर्भीक पुस्तक।

अगर आप भी मेरे जैसे हिमालय से सच्चा प्रेम करते हैं – और न सिर्फ इसे पूजते हों और न सिर्फ इसे छुट्टी बिताने का मनोरम पर्यटन स्थल समझते हों – तो इस पुस्तक को पढ़ने की सलाह मैं आपको दूँगा।

इस किताब को पढ़ने के बाद मुझे एक बात याद आती है। 2012 की मोटरसाइकिल यात्रा के दौरान मेरा छोटा भाई नितिन भी साथ था – अपनी पहली लंबी मोटरसाइकिल यात्रा पर और पहली बार पहाड़ पर। ज़ाहिर तौर पर उत्सुकता ज़्यादा थी और सवाल भी। मैं हिमालय के बारे में जानता-पढ़ता रहता हूँ और सामाजिक-भौगोलिक जानकारियां रखता हूँ, एक आम पर्यटक से ज़्यादा। जब हम बद्रीनाथ पहुंचे तो अगली यात्रा केदारनाथ की हो, ऐसी बात होने लगी। बद्रीनाथ मंदिर के ठीक नीचे अपनी पूरी शान से बहती अलकनंदा के बारे में बात करते हुए मैंने नितिन को केदारनाथ के साथ बहती मन्दाकिनी नदी के बारे में बताया। ये भी कि कैसे पहले मन्दाकिनी नदी दो धाराओं में बहती थी – पूर्वी और पश्चिमी। और कैसे समय के साथ अब सिर्फ एक धारा में ही प्रवाहित होने लगी है। नितिन ने पूछा कि दूसरी तरफ क्या है अब? मुझे जवाब मालूम नहीं था, सो बात वही ख़त्म हो गयी।

मैं आपको बता दूँ कि जब अगले ही साल 2013 में सैलाब आया, तो मन्दाकिनी नदी ने सारे बंधन तोड़ दिए और दुसरे पुराने रास्ते से भी बह निकली – और उसे रास्ते में मिले घर, दुकान, होटल और न जाने क्या-क्या – अपने रास्ते में उसे मनुष्य का किया अतिक्रमण मिला। और वो उसे बहा ले गयी… पंत जी अपनी पुस्तक के बारे में इस बारे में विस्तार से लिखते हैं… उसे पढ़कर मेरी आँखे भर आईं और भाई से हुयी बात याद हो आयी।

अंग्रेजी उपन्यासकार कजाओ इशीगोरो के हवाले से लेखक ने लिखा है:

“जैसे शतरंज के खेल में जब तक हम अपनी चाल के ऊपर से ऊँगली नहीं उठाते, हमें अपनी ग़लती का अहसास नहीं होता, वैसे ही प्राकृतिक आपदाओं का अहसास भी अचानक ही होता है जब हमारी गलतियाँ अति कर देती हैं।”

2012 में मेरे पास इस प्रश्न का उत्तर नहीं था कि मन्दाकिनी के दूसरे रास्ते में क्या है। 2013 के बाद से मेरे पास इस प्रश्न का उत्तर नहीं है कि क्यों प्रशासन आंखें मूंदे रहा इतने वर्षों से लगातार फैलते अतिक्रमण पर। हमने नदी के रास्ते में अपना घर बनाया और अब दोष नदी को, कि उसने अपना वही रास्ता वापस चुन लिया, तो वो दैवी आपदा है?

मैं लेखक से पूर्णतया सहमत हूँ कि यह कोई दैवी आपदा नहीं थी। ना उत्तराखण्ड में, ना ही कश्मीर और नेपाल में। ये मनुष्य के लालच का परिणाम हैं, जिसे हम दैवी आपदा और हिमालय का प्रकोप और न जाने और क्या-क्या नाम देते हैं।

2016 – मैं फिर से तैयार हूँ मई माह में बद्रीनाथ जाने को। इस बार मेरी और नेहा की माएं भी साथ जा रहीं हैं। वो 2013 में नहीं जा पाईं थी – वही साल जब सब जल-मग्न  हो गया था। परिवार ने तब चैन की सांस ली थी कि वो दोनों उस साल चार-धाम यात्रा पर नहीं जा पाईं। वो चैन की सांस जो हज़ारों-लाखों परिवार नहीं ले पाए। हिमालय मुझे फिर बुला रहा है और मैं इस बार कुछ डरता हुआ सा, पहली बार ऐसा महसूस करते, जा रहा हूँ।

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विचारों की सान पर…

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आज ‘असली शहीद दिवस’ है – बस हम जानते नहीं हैं।

शहीद शिवराम राजगुरु, शहीद सुखदेव थापर और शहीद सरदार भगत सिंह 23 मार्च 1931 को अपना बलिदान दे कर जा चुके हैं। देश स्वतंत्र भी है, शायद। कम से कम किसी दूसरे देश का गुलाम नहीं है, बाकी तरह की गुलामियत के बारे में नहीं कहता।

भगत सिंह ने जीवन के कुल 23 वर्ष ही पूरे किये। जितना ज्यादा मैं जानता-पढ़ता हूँ उनके बारे में, मेरा आश्चर्य बढ़ता जाता है कि इस छोटी सी उम्र में उनके सोचने-समझने की क्षमता कितनी जागृत और परिपक्व थी। क्या आप जानते हैं उनके विचार और लड़ाई सिर्फ ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ ही नहीं थी; सामाजिक पिछड़ेपन, साम्प्रदायिकता, अकर्मण्यता और विचारों के क्षेत्र में अन्धविश्वास के विरुद्ध भी उनकी लड़ाई थी? शायद आज का युवक ये जानता ही नहीं। और ऐसा क्यों न हो, जब हमारी अपनी ‘स्वतंत्र’ सरकारों ने ही हमारे क्रांतिकारियों के विचारों को, उनकी याद को, महज एक ‘धन्यवाद्’ का रूप दे रखा है जो आज के दिन की तरह समाचार-पत्रों में एक-चौथाई पेज में छपता है, बस।

भगत सिंह के बारे में बात करते हुए एक जगह ‘शहीद भगत सिंह शोध समिति’ के डॉ. जगमोहन सिंह और डॉ. चमन लाल ने लिखा है (पुस्तक: ‘भगतसिंह और उनके साथियों के दस्तावेज’) –

“…आज सबसे बड़ी ज़रूरत इस बात की है कि शहीद भगत सिंह के मूल वैचारिक तत्त्व को जाना व समझा जाये। यह पहचानने की ज़रूरत है कि वे कौन से सिद्धान्त थे, कौन से तरीके थे और कौन से गुण थे, जिससे भगत सिंह आत्म-बलिदान करनेवालों में सबसे ऊँचे स्थान के अधिकारी बने? वे कौन सी परिस्थितियाँ थीं, जिन्होंने भगत सिंह को भारतीय चेतना का ऐसा अन्श बनाया कि एक ओर तमिलनाडु में उन पर कविताएँ लिखी जाती हैं तो दूसरी ओर भोजपुर में होली के गीत में ‘भगत सिंह की याद में अँचरिया भीग जाती है।’ लेकिन ऐतिहासिक दुखान्त यह भी घटता है कि जब वर्तमान की समस्याओं का सामना करने के लिए हम अपने अतीत से उदाहरण खोजते हैं तो अतीत के सारतत्व को नहीं, उसके रूप को अपनाने की कोशिश करते हैं, जैसा कि भगत सिंह व उनके साथियों के साथ सरकारी और कुछ अन्य प्रचार-माध्यमों ने किया है।”

लेखकगण आगे लिखते हैं,

“शहीद भगत सिंह न सिर्फ वीरता, साहस, देशभक्ति, दृढ़ता और आत्मा-बलिदान के गुणों में सर्वोत्तम उदाहरण हैं, जैसा कि आज तक इस देश के लोगो को बताया-समझाया गया है, वरन वे अपने लक्ष्य के प्रति स्पष्टता, वैज्ञानिक-ऐतिहासिक दृष्टिकोण से सामाजिक समस्याओं के विश्लेषण की क्षमता वाले अद्भुत बौद्धिक क्रांतिकारी व्यक्तित्व के प्रतिरूप भी थे, जिसे जाने या अनजाने आज तक लोगो से छिपाया गया है।”

मैं समझता हूँ कि यह सच बात है कि हमारी सरकारों ने भगत सिंह और अन्य साथी क्रांतिकारियों के विचारों की पूर्णता को जन-मानस के सामने लाने का कार्य नहीं किया है। पर क्या ये भी सच नहीं है कि देश के नागरिकों ने, युवा-समाज ने भी अपनी ओर से ईमानदार कोशिश ही नहीं की है जानने की? क्या आज भी हम भगत सिंह का सिर्फ क्रांतिकारी स्वरुप नहीं जानते? और क्या हमने कोशिश की है कि हम भगत सिंह के बौद्धिक और वैचारिक स्वरुप को जान पाएं और उनसे सीखें?

कई बार सुनता हूँ कि किस प्रकार से देश में नेतृत्व का अभाव है, ज्ञान का तो और भी ज्यादा। शिकायत है कि नेता नहीं मिलते। और सिर्फ राजनीति की बात नहीं हो रही यहाँ पे, कार्य-क्षेत्र में तो नेतृत्व-क्षमता के अभाव का रोना लगभग रोज़ ही सुनता हूँ। आप भी शायद मानेंगे। पर फिर पूछने की इच्छा होती है कि क्या हम वास्तव में सीख रहे हैं पुराने नेतृत्व से, विचारों से? वो नेतृत्व और विचार जो सिर्फ समय के हिसाब के पुराने होंगे, पर परिपेक्ष्य, उपयोगिता और प्रासंगिकता के हिसाब से बेहद कारगर हैं आज…

“स्वतंत्रता का पौधा शहीदों के रक्त से फलता है”, भगत सिंह ने लिखा था। शहीद राजगुरु, शहीद सुखदेव और शहीद सरदार भगत सिंह के विचारों व कर्मों से रोपित और रक्त से संचित आज ये पौधा भले ही पेड़ बन गया हो, मीठे फ़लों से बहुत दूर है।

आओ दोस्तों, आज शहीदी दिवस पर ये प्रण लें कि जानना शुरू करेंगे उन सिद्धांतो को, उन विचारों को, जिन्होंने एक 23-वर्षीय युवक भगत को ‘शहीद सरदार भगत सिंह’ बनाया। शायद ये हमारे भी कुछ काम आ जायें…

Written by RRGwrites

March 23, 2016 at 1:34 PM

Love, Hope & Care…

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RRGwrites

Those of you who know me well, know there is a gardener inside me. Today was one of those days, when the gardener in me felt truly, abundantly happy…

What you see as an image of blooming flowers above, was one of the saplings that I had planted early winters this year. I hoped for a lush bloom, a garden full of flowers, covering the otherwise dusty environs of the Millennium City – Gurgaon – that I live in.

Not to be, not so easy.

One fine morning, I woke up to find most of these saplings all crushed and trampled down!  And from the looks of it, this havoc was caused by a stray dog, who must have dug deep into the rows of my plants in his gay mischief….

I was crestfallen…

In one corner, I saw nearly dead a small sapling. I was so dejected that I didn’t give it a second thought. And with a heavy heart, I got ready and drove off to office.

All through my drive, the dying sapling kept coming back in front of my eyes… Around lunch time, I started to feel quite uneasy… and then, I decided to drive back home. Once home, I dug this sapling out, which looked even more worse than morning and planted it in a mud-glass, most carefully, and said a silent prayer…

3 months today from that fateful day, with a hope against hope and a lot many prayers and care later, I saw this sapling blooming into a bunch of flowers! The gardener in me felt the same happiness that I get when I see my son growing every day… The hope, the love, the prayers and the care – they all paid off.

Happy to share with you…

As they said, looks like faith is still known to move mountains…

Written by RRGwrites

March 16, 2016 at 12:28 AM

Leadership Towers & Foundations

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