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On life…and learning

Archive for March 2015

What If We Fail…

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India Wold Cup Team

India meets Australia tomorrow – the semi-final of ICC World Cup 2015. The game we all have been waiting for… a game in which billions of Indians all over the world don’t want Dhoni and men to fail… a game, where victory is being treated like a need, where failure isn’t an option.

I am feeling quite restless. What if we fail tomorrow? What if the journey of the Indian team’s world cup ends tomorrow? The same team, which fared extremely poorly down under in last 4 months and which almost has risen like a Phoenix in last 7 matches of this tournament. What if they lose now…

In this hour of my restlessness, I find solace and hope in the words of a very old advertisement I had read. It was by Bajaj Auto, and if I recall right, was a campaign for the motorcycle brand ‘Bajaj Caliber.’ I read it long, long ago, loved it and noted it in my diary. It has, since then, helped me sail through some of my own tough moments;

What are we going to do when we fail?

When we find the wrong kind of tears,

running down our cheeks.

When we look at our Gods

and see mortals instead.

When the sports page

reads like an obituary.

When we know all others are

celebrating our grief.

What are we going to do when we fail?

We’re going to look up from our toes.

And into the sun. Without flinching.

We’re going to walk out there alone.

Again.

Grit our teeth.

Take guard.

And wait for the next ball.

Like a true fan, I too would love India to win tomorrow. But more than that, I would love the game of cricket to win, the game to stay belonged to the gentlemen, where we are allowed to fail at time… and not crucified for it.

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गाँधी की मूरत और भगत सिंह के विचार – क्या चुनेंगे आप?

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Gandhi at London Square

कुछ दिनों से गाँधीजी की प्रतिमा की बड़ी चर्चा है – वो जो लंदन के पार्लियामेंट स्क्वायर पर ब्रिटिश सरकार ने लगाई है। चर्चा का मौजूं कुछ यों है कि क्या मूर्ति वास्तव में गाँधी बाबा के शक्लो-सूरत की है, या बहु-प्रसिद्ध और सफ़ल फ़िल्मकार सर बेन किंग्सले के जैसी दिखती है, वही जिन्होंने ‘गाँधी’ फिल्म में बापू की भूमिका निभायी थी।

मैं स्तब्ध सा हूँ। आज वास्तविक शहीद दिवस है, २३ मार्च, और हमारे चिंतन का विषय इतना बुतपरस्त और इतना पथरीला है…

दो साल पहले मैंने यह लेख लिखा था,  आज ही के दिन… कुछ भी नहीं बदला शायद…

‘विचारों की सान पर…’

आज ‘असली शहीद दिवस’ है – बस हम जानते नहीं हैं।

शहीद शिवराम राजगुरु, शहीद सुखदेव थापर और शहीद सरदार भगत सिंह 23 मार्च 1931 को अपना बलिदान दे कर जा चुके हैं। देश स्वतंत्र भी है, शायद। कम से कम किसी दूसरे देश का गुलाम नहीं है, बाकी तरह की गुलामियत के बारे में नहीं कहता।

भगत सिंह ने जीवन के कुल 23 वर्ष ही पूरे किये। जितना ज्यादा मैं जानता-पढ़ता हूँ उनके बारे में, मेरा आश्चर्य बढ़ता जाता है कि इस छोटी सी उम्र में उनके सोचने-समझने की क्षमता कितनी जागृत और परिपक्व थी। क्या आप जानते हैं उनके विचार और लड़ाई सिर्फ ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ ही नहीं थी; सामाजिक पिछड़ेपन, साम्प्रदायिकता, अकर्मण्यता और विचारों के क्षेत्र में अन्धविश्वास के विरुद्ध भी उनकी लड़ाई थी? शायद आज का युवक ये जानता ही नहीं। और ऐसा क्यों न हो, जब हमारी अपनी ‘स्वतंत्र’ सरकारों ने ही हमारे क्रांतिकारियों के विचारों को, उनकी याद को, महज एक ‘धन्यवाद्’ का रूप दे रखा है जो आज के दिन की तरह समाचार-पत्रों में एक-चौथाई पेज में छपता है, बस।

भगत सिंह के बारे में बात करते हुए एक जगह ‘शहीद भगत सिंह शोध समिति’ के डॉ. जगमोहन सिंह और डॉ. चमन लाल ने लिखा है (पुस्तक: ‘भगतसिंह और उनके साथियों के दस्तावेज’) –

“…आज सबसे बड़ी ज़रूरत इस बात की है कि शहीद भगत सिंह के मूल वैचारिक तत्त्व को जाना व समझा जाये। यह पहचानने की ज़रूरत है कि वे कौन से सिद्धान्त थे, कौन से तरीके थे और कौन से गुण थे, जिससे भगत सिंह आत्म-बलिदान करनेवालों में सबसे ऊँचे स्थान के अधिकारी बने? वे कौन सी परिस्थितियाँ थीं, जिन्होंने भगत सिंह को भारतीय चेतना का ऐसा अन्श बनाया कि एक ओर तमिलनाडु में उन पर कविताएँ लिखी जाती हैं तो दूसरी ओर भोजपुर में होली के गीत में ‘भगत सिंह की याद में अँचरिया भीग जाती है।’ लेकिन ऐतिहासिक दुखान्त यह भी घटता है कि जब वर्तमान की समस्याओं का सामना करने के लिए हम अपने अतीत से उदाहरण खोजते हैं तो अतीत के सारतत्व को नहीं, उसके रूप को अपनाने की कोशिश करते हैं, जैसा कि भगत सिंह व उनके साथियों के साथ सरकारी और कुछ अन्य प्रचार-माध्यमों ने किया है।”

लेखकगण आगे लिखते हैं,

“शहीद भगत सिंह न सिर्फ वीरता, साहस, देशभक्ति, दृढ़ता और आत्मा-बलिदान के गुणों में सर्वोत्तम उदाहरण हैं, जैसा कि आज तक इस देश के लोगो को बताया-समझाया गया है, वरन वे अपने लक्ष्य के प्रति स्पष्टता, वैज्ञानिक-ऐतिहासिक दृष्टिकोण से सामाजिक समस्याओं के विश्लेषण की क्षमता वाले अद्भुत बौद्धिक क्रांतिकारी व्यक्तित्व के प्रतिरूप भी थे, जिसे जाने या अनजाने आज तक लोगो से छिपाया गया है।”

मैं समझता हूँ कि यह सच बात है कि हमारी सरकारों ने भगत सिंह और अन्य साथी क्रांतिकारियों के विचारों की पूर्णता को जन-मानस के सामने लाने का कार्य नहीं किया है। पर क्या ये भी सच नहीं है कि देश के नागरिकों ने, युवा-समाज ने भी अपनी ओर से ईमानदार कोशिश ही नहीं की है जानने की? क्या आज भी हम भगत सिंह का सिर्फ क्रांतिकारी स्वरुप नहीं जानते? और क्या हमने कोशिश की है कि हम भगत सिंह के बौद्धिक और वैचारिक स्वरुप को जान पाएं और उनसे सीखें?

कई बार सुनता हूँ कि किस प्रकार से देश में नेतृत्व का अभाव है, ज्ञान का तो और भी ज्यादा। शिकायत है कि नेता नहीं मिलते। और सिर्फ राजनीति की बात नहीं हो रही यहाँ पे, कार्य-क्षेत्र में तो नेतृत्व-क्षमता के अभाव का रोना लगभग रोज़ ही सुनता हूँ। आप भी शायद मानेंगे। पर फिर पूछने की इच्छा होती है कि क्या हम वास्तव में सीख रहे हैं पुराने नेतृत्व से, विचारों से? वो नेतृत्व और विचार जो सिर्फ समय के हिसाब के पुराने होंगे, पर परिपेक्ष्य, उपयोगिता और प्रासंगिकता के हिसाब से बेहद कारगर हैं आज…

“स्वतंत्रता का पौधा शहीदों के रक्त से फलता है”, भगत सिंह ने लिखा था। शहीद राजगुरु, शहीद सुखदेव और शहीद सरदार भगत सिंह के विचारों व कर्मों से रोपित और रक्त से संचित आज ये पौधा भले ही पेड़ बन गया हो, मीठे फ़लों से बहुत दूर है।

आओ दोस्तों, आज शहीदी दिवस पर ये प्रण लें कि जानना शुरू करेंगे उन सिद्धांतो को, उन विचारों को, जिन्होंने एक 23-वर्षीय युवक भगत को ‘शहीद सरदार भगत सिंह’ बनाया। शायद ये हमारे भी कुछ काम आ जायें…

___________

मैंने लंदन स्क्वायर पर स्थापित गाँधी-मूर्ती का एक चित्र देखा… कुछ चिंतामग्न प्रतीत होते हैं वो। क्या हम भी चिंतन करेंगे कुछ आज? बताइएगा…

Written by RRGwrites

March 23, 2015 at 12:09 AM

5 Things We Can Change This Women’s Day…

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Wrote this last year on Women’s day! Has anything changed?

RRGwrites

RRGwritesInternational Women’s Day is round the corner; and like every year, quite a lot is being said and written about the subject. My view; every such day is a soft reminder to all of us that some things should change, and they better change for good, else, what’s the point in the entire fuss we make about this day! More importantly, such change should bring about simple, yet meaningful difference in lives of those around us…in our daily lives.

As a man who works in offices, travels extensively, meets hundreds of people every week, and observe myriad human behaviour, here are the five extremely easy (and yet, quite apparently difficult for a lot of us!) things I believe we can change, in recognition to the Women’s Day:

  1. At work, let’s acknowledge that women are equal in all aspects, if not better; and let’s do so purely on merits…

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Written by RRGwrites

March 8, 2015 at 9:51 PM

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