RRGwrites

On life…and learning

मासूमों की क़ब्र

leave a comment »

पाक़िस्तान में मासूमियत का क़त्ले-आम देखा। तबसे जी कुछ मतला सा रहा है। लखनऊ का होने की वजह से, गंगा-जमुनी तहज़ीब में पला-बड़ा होने से, मैंने इस्लाम को, इस्लामियत को बड़े क़रीब से देखा और समझा है और उसके बन्दों से मेरी बड़ी पुरानी और मज़बूत वाक़फ़ियत है। फिर भी मैं बिलकुल भी समझ नहीं पा रहा हूँ कि ये कौन सा और इस्लाम और कौन सी खुदा-की-बन्दगी है जो पाकिस्तान के स्कूली-बच्चों पर कल नाज़िल हुयी! यह वो इस्लाम तो नहीं है जिसे मैं जानता हूँ!

मैं जिस इस्लाम को जानता हूँ, उस में तो ऐसी हैवानियत की कोई जगह नहीं, बल्कि ऐसे इस्लाम के नाम पर दुनिया को ठीक करने का दावा करने वाले इन तालिबानी अधर्मियों की खुद इस्लाम में कोई जगह नहीं।

जिस साल दुनिया में एक तरफ बच्चों के उत्थान के लिए काम करने वाले कैलाश सत्यार्थी और खुद पाकिस्तानी बहादुर बच्ची मलाला यूसुफ़ज़ई को हम नोबेल पुरुस्कार से सम्मानित करते हैं, उसी साल उसी दुनिया में मासूम बच्चों का इस बेरहमी से खून किया जाये, ये कैसी दुर्दान्त विडंबना है?

निदा फ़ाज़ली साहब की कुछ पंक्तियाँ याद आती हैं:

हर बार ये इल्ज़ाम रह गया..! हर काम में कोई काम रह गया..!! नमाज़ी उठ उठ कर चले गये मस्ज़िदों से..! दहशतगरों के हाथ में इस्लाम रह गया..!! ख़ून के नापाक ये धब्बे, ख़ुदा से कैसे छिपाओगे? मासूमों के क़ब्र पर चढ़कर, कौन से जन्नत जाओगे?

प्यारे बच्चों, तुमसे माफ़ी ही माँग सकता हूँ कि हम सभी बड़े आपको सुरक्षा नहीं दे पाये। उम्मीद है कि जिस ख़ुदा, जिस अल्लाह के नाम पर तुम्हारा क़त्ल किया गया, वो खुदा तुम्हे अपने घर, अपनी जन्नत में वो प्यार दे जो हम नहीं दे पाये।

Advertisements

Written by RRGwrites

December 17, 2014 at 3:55 PM

Posted in Life

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: