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On life…and learning

Archive for October 2014

When You Let Your Performers Go…

with one comment

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all-the-best-scrapsAs leader of large team, which consists of bright and smart managers, I manage a lot of tough situations. One of the most crucial such situation arises when one of my high-performer team members expresses his or her intentions to move on and pursue other interests; in short, wants to leave the job.

This is indeed a tough moment for any people manager, especially if the team is built painstakingly over years and when it consists of stars who have consistently done well for the team and the organization.

However, I do not baulk at such moments. Neither do I feel bad or act vindictive. In fact, I always feel amused when I hear about how bosses or companies change dramatically as soon as someone declares his intent to quit the job. Right from acting in a rather discourteous manner – ‘How can you?!!’, (As if the employee cheated…

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October 28, 2014 at 11:55 PM

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आओ, हम कुछ बदलें…

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The Magical City of Delhi…

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Dilli

आज बड़े दिनों के बाद एक पुराने मित्र से बात हुयी। हम बचपन में साथ में पढ़ते थे। बाहरवीं के बाद वो देश से बाहर चला गया, पढ़ाई पूरी की, वहीं नौकरी कर ली। देश आता-जाता रहा, पर पिछले 15 सालों से दिल्ली में समय नहीं बिताया। बस, अभी कुछ दिन हुए, अपनी कंपनी के एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में एक साल के लिए दिल्ली आया है।

उसने दुनिया घूमी है, और कुछ तीन महीनों से दिल्ली में रहता है। खूब बातें हुयीं, कई पुरानी यादें ताज़ा हुयी। कुछ यूँही ख्याल आया, मैं पूछ बैठा, “अमां यार, बड़ी दुनिया घूम आये, कई छोटे-बड़े शहर देख डाले तुमने। ये तो बताओ कि दिल्ली कैसी लगी?”

“अच्छी है, भाई, बहुत बढ़िया। जो सुनते थे, उससे बेहतर ही है कुछ मायनों में”, उसने कहा।

“तो फिर ये कहो कि वो क्या पांच चीज़ें बदल जाएँ यहाँ तो ये शहर दुनिया के उम्दातरीन शहरों में शामिल…

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October 25, 2014 at 2:16 AM

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बिज़नेस लोग हैं…सिर्फ लोग

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अकसर ऐसा सुनते हैं कि सिनेमा असल ज़िंदगी का आईना होता है। अगर हम सोचें, और सीखना चाहें, तो सरलता से किये हुए अभिनय, सरलता से कहे हुए संवादों के ज़रिए बहुत सशक्त बातें सीखीं जा सकती हैं। आज एक ऐसी ही फिल्म देखने का अवसर मिला – ‘राकेट सिंह – सेल्समेन ऑफ़ द इयर’। शायद कुछ साल पहले आई थी; मालूम नहीं कि बहुत हिट थी या नहीं, ज़्यादा सुना भी नहीं तब इसके बारे में। देख के अच्छा लगा; इस एच-आर मैनेजर को अपने ‘सेल्स’ के दिन याद आ गए।
एक संवाद मेरे साथ रह गया; आपसे बांट रहा हूँ –

…करते-करते पता चला कि बिज़नेस भी कोई चालाकी, कोई स्कीम, कोई जादू नहीं है। है तो बस एक चीज़, लोग… जो आपके साथ काम करते हैं, जो आपके कस्टमर हैं। पर आपको तो कभी लोग दिखे ही नहीं… आपको तो सिर्फ नंबर दिखे… किसने कितने नंबर अचीव किये, किसने कितने टारगेट्स तोड़े…

मुझे हमेशा लोग…

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Written by RRGwrites

October 3, 2014 at 12:22 AM

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