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यह कैसे पंच-परमेश्वर?

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“पंच न किसी के दोस्त होते हैं, न किसी के दुश्मन। पंच के दिल में खुदा बसता है। पंचों के मुँह से जो बात निकलती है, वह खुदा की तरफ से निकलती है।…(पंच के रूप में) मैं इस वक्त न्याय और धर्म के सर्वोच्च आसन पर बैठा हूँ। मेरे मुँह से इस समय जो कुछ निकलेगा, वह देववाणी के सदृश है-और देववाणी में मेरे मनोविकारों का कदापि समावेश न होना चाहिए। मुझे सत्य से जौ भर भी टलना उचित नहीं!”

20388136.cmsमुंशी प्रेमचंद की कहानी – पंच-परमेश्वर – के यह वाक्य कल से मेरे मन में गूँज रहे हैं। कारण? वो शर्मनाक वाक़या, जहाँ पश्चिम-बंगाल के बीरभूम ज़िले के सुबलपुर गाँव की ‘पंचायत’ और उसके मुखिया ने अपनी ईश्वरीय सत्ता का इस्तेमाल करके एक आदिवासी लड़की को सज़ा देने का फैसला सुनाया। और सज़ा क्या? एक दर्जन से अधिक लोगों को इस ईश्वर ने आदेश दिया की वो उस बेबस लड़की का पूरी हैवानियत के साथ, सबके सामने, बलात्कार करें। और न सिर्फ यह, खुद पंच-रुपी-परमेश्वर ने भी इस खुदाई फरमान के पालन में हिस्सा लिया।

मैं स्तब्ध हूँ! …ये कैसे पंच हैं? कौन से परमेश्वर हैं? और क्या देववाणी बोल रहे हैं, कौन सा खुदाई इंसाफ सुना रहे हैं??

अपने पूरे बचपन मैं मुंशीजी की इस कथा को न्याय की पराकाष्ठा मानता आया… कई बार जब कठिन न्यायिक निर्णय लेने पड़े कार्य-क्षेत्र में, तो इस कथा ने मुझे ज़िम्मेदारी का अहसास कराया, और निर्विकार रूप से निर्णय लेने का सामर्थ्य और सद्बुद्धि दी।

पर इस नयी तरह के पंच-परमेश्वरीय न्याय ने मुझे एकदम झकझोर दिया है। मैं शर्मिंदा हूँ, बेहद शर्मसार…

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अनुलेख: बहुत मुमकिन है कि इस अंग्रेज़-दां ज़माने में आपने हिंदी में लिखी मुंशी प्रेमचंद की यह कथा न पढ़ी हो। अगर पढ़ना चाहें, तो यहाँ पढ़ सकते हैं। पढ़ने के बाद शायद बीरभूम की यह घटना आपको भी इन कलयुगी पंच-परमेश्वरों और उनके पंचायती इन्साफ पर शर्मिंदा होने पर मज़बूर कर दे…

Image-credit: indiatimes.com

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