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सफलता का मंत्र

with one comment

N Shivakumar IIM Newspaper Vendorअभी कुछ देर पहले NDTV पर ‘हम लोग’ कार्यक्रम देखा। कुछ ऐसा अनुभव हुआ जो आपसे बाँटना चाहता हूँ। अनुभवी पत्रकार रवीश कुमार ने मंच पर तीन मेधावी छात्रों – निरीश राजपूत, कोमल गणात्रा और एन. शिवा कुमार – को आमंत्रित किया था जिन्होंने समाज में निचले तबके से होने के बावज़ूद और अनेक मुश्किलों को पार करते हुए, अपनी मेहनत और लगन से, अपने मजबूर इरादे से इस साल भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) और भारतीय प्रबंधन संस्थान (IIM) में स्थान अर्जित किये हैं।

इस एक घंटे के कार्यक्रम में कई अच्छी बातें सुनी और देखी; कैसे एक छोटे से कस्बे का एक गरीब लड़का दोस्तों की मदद से अपनी पढ़ाई करता है और IAS में चयनित होता है; एक युवती, जिसे उसके दहेज़-लोभी ससुराल वाले घर से निकाल देते हैं, वो सामाजिक बहिष्कार से लड़ते हुये प्रशासनिक सेवा का इम्तिहान देती है और सफल होती है। और कैसे एक अख़बार बाँटने वाला युवक देश के सबसे प्रतिष्ठित प्रबंधन संस्थान IIM में पढ़ने का अपना अटूट इरादा पूर्ण करता है। उनके दमकते चेहरे देख के एक अजीब सी ख़ुशी हुयी, मानों मैंने खुद ही कुछ हासिल किया हो…

एक बात जो मन को छू गयी, वो आप को बताना चाहता हूँ। बैंगलोर के शिवा कुमार, जो कि पिछले दस-पन्द्रह सालों से, अपने स्कूल के दिनों से अख़बार बांटते हैं, आज अपने अनुभव साझा कर रहे थे। अनपढ़ माँ और कर्ज़ के बोझ से लदे ट्रक-ड्राइवर पिता का ये लाल अपने पूरे बचपन और युवावस्था के दौरान रोज़ सुबह 4 बजे उठ कर अख़बार डालता रहा; और अपने काम में इतना बेहतर हुआ कि न्यूज़-पेपर वेंडर बना; एक करुण और दयावान ग्राहक की मदद से अपनी पढ़ाई पूरी करी, इंजीनियर बना और अब IIM कलकत्ता पढ़ने जा रहा है।

रवीश ने शिवा से पूछा कि आखिरी बार उसने अख़बार कब बांटें थे। सहजता से उत्तर आया, “कल ही; यहाँ आने से पहले”। तालियों की गड़गड़ाहट से अविचलित उसने और आगे कहा, “मैं इस काम की वजह से आज आगे आया और यहाँ तक पहुंचा हूँ, भला उसे कैसे छोड़ता…”

कितनी उत्तम बात है, और कितनी ईमानदारी से कही गयी है…

मुझसे बहुत से लोग ये कई बार पूछते हैं कि सफलता का मंत्र क्या है। मैं समझता हूँ कि शिवा कुमार ने अपनी बात से बड़ी ही सरलता से इस प्रश्न का उत्तर दे दिया – सफलता का मंत्र अपने काम से ईमानदारी बरतने में है। जो व्यक्ति उन्नति के रास्ते पर बढ़ते हुए अपने आप को अपने काम से बड़ा समझने लगे, वो कुछ समय तक सफल तो हो सकता है, सार्थक नहीं बन सकता।

उम्मीद है कि आज के छात्र और कामकाज़ी लोग इस बात का महत्व समझेंगे। अब अपने अनुभव बाँटनें की आपकी बारी है; आप क्या सोचते हैं, बताईयेगा।

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Photo-credit: ibnlive.in.com

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One Response

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  1. Bahut hi Khoob likha hai sir…wahh..!!

    Shashikant Singh

    May 31, 2013 at 8:30 AM


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