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On life…and learning

क़िताबियत…

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Readingआज ‘वर्ल्ड बुक डे’ है। अपने आप में अनूठा ये दिवस हर साल 23-अप्रैल को सौ से भी अधिक देशों में मनाया जाता है। UNESCO द्वारा स्थापित ये दिन पुस्तकों, लेखकों, प्रकाशकों और कॉपीराइट का प्रतीकात्मक माना जाता है। कुछ ऐसा मान लीजिए कि ये क़िताबों का, पढ़ने का, पाठन-पठन, अध्ययन का उत्सव है।

मैं क़िताबों का बड़ा शौक़ीन हूँ, बचपन से ही। अमूनन छोटे बच्चे वो सब जल्द सीख जाते हैं जो वो अपने वाल्दैन को करते देखते हैं। हमने यह आदत अपनी माँ से पाई, जो जैसे ही बाबा सुबह काम को जाते और घर का काम ख़त्म होता, कोई न कोई क़िताब, पत्रिका, समाचार-पत्र, इत्यादि पढ़ती मिलतीं। रोज़ दिन के वक्त जब मैं स्कूल से वापस आता तो ये नज़ारा सामने पाता। मालूम होता है कि उस समय मेरे बाल-मन को ये दृश्य भा गया होगा; फिर तो जो ‘क़िताबियत’ की लत लगी, वो आज तक जारी है।

मुझे याद आता है कि आठ-नौ साल का होते-होते मैंने बहुत सारी किताबें पढ़ ली थीं। न सिर्फ़ किताबें, पर बहुत सारी कॉमिक्स और पत्रिकाएँ भी। तो जो थोड़ा बहुत विज्ञान, सामान्य-ज्ञान और दुनिया-भर के देशों की रैय्यत-रवायत के बारे में जानकारी आज मुझे है या और जानने की उत्सुकता कभी हुई, उसका इल्ज़ाम स्कूल की क़िताबों पर नहीं, ‘अमर चित्रकथा’ और ‘टिंकल’ के अनेकानेक अंकों पर है। इसी तरह से जो देश-दुनिया की राजनीति के बारे में पढ़ने का कीड़ा लगा, वो किसी और वजह से नहीं पर उस ज़माने की पत्रिका ‘माया’ से लगा; और मैं कह सकता हूँ कि इस विलुप्त हो चुकी पत्रिका का मुकाबला कोई समकालीन राजनितिक पत्रिका नहीं कर सकती।

बचपन में क़िताबें पढ़ने का कुछ फ़ितूर सा था। वैसे तो हम घर पर होते नहीं थे – खेल-कूद ज़िन्दाबाद, पर जब होते तो कोई-न-कोई क़िताब हर वक्त हाथ में होती थी। रिश्तेदारी में आना-जाना होता तो भी वहां कुछ पढ़ने के लिए ढूँढ कर हम एक कोना पकड़ लेते, और कई बार याद है कि डांट खाई कि अब खाना खाते समय तो क़िताब से नज़रें हटा लो; पर हम भी एक अलग ही ढीठ थे भाई, मज़ाल है कि मान जायें। उस ज़माने में एक नयी बला भी आयी थी – विडियो-गेम्स। सारे चचेरे-ममेरे भाई-बहन उसी पर लगे रहते, पर हमें तो कुछ मज़ा नहीं आया ‘मारियो’ खेलने में कभी; हम तो बस जब भी चारदीवारी के भीतर होते, तो कुछ-न-कुछ पढ़ते ही पाए जाते.

एक और किस्सा इसी क़िताबियत का ज़हन में है – लखनऊ का बाल-संग्रहालय और उसकी लाइब्रेरी। उत्तर प्रदेश के शायद आखिरी सभ्य और जनपालक मुख्यमंत्री, स्व. चन्द्र भानु गुप्ता जी, ने अपने विशाल सम्पति दान दे कर ऐसी भलमनसाहत से प्रेरित कई संस्थाएं बनायीं थी, जो आज भी चल रही हैं और उन अरबों रुपयों से बने ‘माया-स्मारकों’ से कहीं ज्यादा समाज का भला और ‘परिवर्तन’ कर रहीं हैं। खैर, मैं विषय से भटक रहा हूँ, बात तो क़िताबों की हो रही थी ना। आठ साल की उम्र में माताजी ने हमारी किताबें ख़रीदने के चस्के पर लगाम लगाते हुए हमें इस पुस्तकालय का रास्ता दिखाया, जो कि आना-जाना मिला के पूरे 6-किलोमीटर लंबा था। और इस ग़लतफ़हमी के बिना कि आज के ‘साहबज़ादों’ की तरह कोई लेने-छोड़ने जायेगा, हमें माँ ने कुल दस पैसे का सदस्यता-फॉर्म और सिर्फ दो-रुपयों की ‘कॉशन-मनी’ (जी हाँ, आपने ठीक पढ़ा; अमां मियाँ, तब सस्ते का ज़माना था!) दे कर लाइब्रेरी का मेम्बर बनवा दिया। अब हम जा पहुँचे एक ऐसी दुनिया में जहाँ एक विशालकाए लाइब्रेरी की बरबस मदहोश कर देने वाली महक थी। अब भाई, पुस्तकों की दुनिया कुछ ऐसी ही लगती थी हमें। याद पड़ता है कि दो-तीन महीनों की 1988 की गर्मियों की छुट्टियों में हमने कितनी ही किताबें घोट डालीं – भारतीय और विश्व साहित्य दोनों। अपने राम रोज़ सुबह 9:30 बजे घर से निकलते, पैदल चलते हुए ठीक दस बजे लाइब्रेरी के दरवाज़े पर। और फिर सीधे पांच बजने पर बाहर आना होता। ये कवायद पूरी गर्मी चलती, और बस जिन दिनों क्रिकेट-मैच खेलने के चक्कर में हम ना जा पाते, उन दिनों के लिए एक-दो क़िताबें घर ले आते। ये सिलसिला 1990 तक चला, तब तक हम दस साल के हो गए थे और एक दिन हमें ‘बाल-संग्रहालय’ से बाहर कर दिया गया, यह कह कर कि अब हम ‘बाल’ नहीं रहे! क्या बताएं आपको साहब कि कितना गुस्सा आया; मन हुआ कि पूँछें कि किस नामुराद ने यह तय किया था। पर कुछ लाइब्रेरियन का डर और उससे ज्यादा माँ-बाबा की इज्ज़त के लखनवी लिहाज़ ने मुंह सिल दिया और हम मन-मसोस के रह गए। बड़े दिनों तक इस लाइब्रेरी से बिछड़ने का रंज रहा; आज के ज़माने में शायद ‘ब्रेकअप’ होने पर कुछ ऐसा ही महसूस होता होगा।

Cathedral Library Card

क़िताबों से इश्क कुछ यूं ही परवान चढ़ता रहा; और बहुत से पुस्तकालय जीवन में आये और उनसे बहुत कुछ सीखा और पाया। लखनऊ के कैथेड्रल स्कूल का ‘लाइब्रेरी पीरियड’, जिसके दौरान निराला, नागर और बच्चन से परिचय हुआ और जहाँ लाइब्रेरियन-मैडम सिंह ने अंग्रेजी साहित्य से दोस्ती करवाई। या फिर Symbiosis Law College की लाइब्रेरी, जहाँ दिन के आठ-आठ घंटे बैठ हमने क़ानून से दोस्ती की। उसके और भी फायदे हुए; एक दिन प्रिंसिपल साहब, डा. रास्ते, ने हमे क़ानूनी क़िताबों से पेंच लड़ाते देखा, ना-मालूम कैसे उन्हें हमारे ज़हीन होने का शक़ हुआ और फिर हमें प्रतिष्ठित ‘Symbiosis Law Journal’ का संपादक चुन लिया गया। इस बड़ी ज़िम्मेदारी को निभाते हुए हमने महान वकील ‘नानी पालकीवाला’ के ऊपर एक संस्करण छापा, जो आज भी देश-भर की क़ानून-सम्बंधित पुस्तकालयों में रखा देखा जा सकता है। ये सम्मान भी हमारी क़िताबियत के शौक़ में मिला। एक और बात इस समय की मुझे याद आती है कि वहां की लाइब्रेरियन-मैडम, जो ऊपर से बड़ी ही सख्त-मिजाज़ थीं और जिनसे सब डरते थे, मुझसे एक अबोला स्नेह रखतीं थीं और जब मैं कॉलेज छोड़ कर दिल्ली आ रहा था तो सिर्फ वो थीं वो कुछ दुखी मालूम हुईं थीं।

दिल्ली विश्वविद्यालय आने पर मालूम हुआ कि दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स की रतन टाटा लाइब्रेरी का तो क्या ही कहना, मानो क़िताबों का अथाह समंदर। ऊपर से लॉ-फैकल्टी के पुस्तकालय जाने का जुगाड़ भी हमने ढूँढ लिया था। VKRV छात्रावास में भी प्रो. मित्रा के मार्ग-दर्शन में एक बेहतरीन लाइब्रेरी बनाई गयी थी, जो ज़्यादातर उन छात्रों की दान की हुयी पुस्तकों से बनी थी जो पढ़ाई पूरी कर के ‘कॉर्पोरेट-जगत’ में अपना भविष्य बनाने निकलते थे। इन तीनो जगाहतों के सायों में हमारी क़िताबों से मित्रता चलती रही।

नौकरी में आने के बाद भी यह इश्क़ कम नहीं हुआ; पहले बॉस ने बहुत ही सख्ती से समझा दिया कि मैनेजमेंट में अच्छा करना है तो अपनी जानकारी दुरुस्त रखो। अब हम तो जी खुश हो गए; ‘अँधा क्या चाहे, दो आँखें’ वाली मिसाल मानों सच हो रही हो। सो पढ़ना बदस्तूर जारी रहा और बॉस से भी बिना चापलूसी की ज़हमत उठाये दोस्ती सी हो गयी और फिर उसके बाद बहुत कुछ सीखने को मिला।

सालों बाद जब जीवन-संगिनी से मुलाक़ात हुयी तो मालूम हुआ कि उनकी ज़हीनियत का राज़ भी उनकी क़िताबों से दोस्ती है जो उन्होंने अपने वाल्दैन से विरसे में पायी थी। फिर क्या था, दो क़िताबी शौक़ीनों साथ आने पर और भी कई नयी पुस्तकों से दोस्ती हुयी, और पिछले 6 सालों में अनगिनत क़िताबें पढ़ डाली गयीं। कुछ समय पहले बीवी ने इस शौक को लिखने तक बढ़ाने का मशवरा दिया, जो इस blog की सूरत में तामीर है।

क़िताबों का प्रेम भी अनूठा है। मशहूर इसरायली लेख़क, अमोस ओज ने अपनी आत्मकथा – ‘अ टेल ऑफ़ लव एंड डार्कनेस’– में लिखा है:

“…जब मैं छोटा था, तो मेरा सपना था, बड़ा होकर मैं एक क़िताब बनूँगा। लोगों को चींटियों की तरह मारा जा सकता है। लेखकों को मारना भी कोई मुश्किल काम नहीं, लेकिन क़िताबों को नहीं। आप कितना भी योजनाबद्ध तरीके से किसी क़िताब को ख़त्म कर लेने की कोशिश करें, एक संभावना हमेशा बनी रहेगी कि उसकी कोई एक प्रति दुनिया की किसी न किसी लाइब्रेरी के एक कोने में जिंदा बची हुई है।”

अब ज़माना बदल रहा है और उसके साथ पढ़ने की कला भी। पिछले कुछ सालों में लोगों को नयी तरह से किताबें पढ़ते देखता हूँ – ebooks! कितने तरह के तकनीकी उत्पाद आ गए हैं; Kindle, Google Nexus, iPad ने मानो क़िताबों को एक नया स्वरुप दे दिया है। दुनिया भाग रही है, तो क़िताबें पढ़ने का तरीक़ा भी बदलता जा रहा है। और फिर कहाँ है आज-कल के सिमटते घरों में क़िताबों की अलमारियां लगाने की जगह? और फिर ये क़िताबें सहेजने की ज़हमत उठाने की ज़रूरत क्या जब एक Kindle हज़ारों-हज़ार पुस्तकें अपने छोटे से आकार में समेट लेता है…और ये भी देखता हूँ कि ebook-reader बनाने वाली बड़ी-बड़ी कंपनियों ने अपने उत्पादों को असल क़िताब की शक्ल-सूरत देने की कोशिश की है, शायद मेरे जैसे कुछ बीसवीं सदी के क़िताबी-कीड़ों के मद्देनज़र…

आज मेरे एक हाथ में एक क़िताब है जो मैं एक बड़ी-सी क़िताबों की दुकान से खोज कर लाया हूँ, और दूसरे हाथ में एक iPad, जिसमें कई क़िताबें समायी हुईं हैं। मन बारहां असल क़िताब की तरफ़ भागता है; उसके पन्नों में मेरे बचपन की महक है, उन पुस्तकालयों की यादें हैं जहाँ मैंने अपने सैकड़ों दिन बिताये, उन दिनों की याद है जब पैसे जोड़ कर मैं क़िताबें खरीदता था और सहेज कर रखने का जतन करता था। इस बेगानी सी ebook में वो बात कहाँ…

गुलज़ार साहब की एक नज़्म आज पढ़ी, जिसका शीर्षक है – ‘क़िताबें झांकती हैं’। शायद यह पंक्तियाँ उन्होंने किसी ऐसे ही मौके पर लिखी है –

क़िताबें झांकती हैं बंद अलमारी की शीशों से
बड़ी हसरत से तकती हैं
महीनों अब मुलाकात नहीं होती
जो शामें उनकी सोहबत में कटा करती थीं
अब अक्सर गुज़र जाती हैं कंप्यूटर के परदे पर

बड़ी बेचैन रहती हैं क़िताबें
उन्हें अब नींद में चलने की आदत हो गयी है
जो ग़ज़लें वो सुनातीं थीं कि जिनके शल कभी गिरते नहीं थे
जो रिश्ते वो सुनातीं थीं वो सारे उधड़े-उधड़े से हैं

कोई सफ़ा पलटता हूँ तो इक सिसकी निकलती है
कई लफ़्ज़ों के मानी गिर पड़े हैं
बिना पत्तों के सूखे ठूंट लगते हैं वो सब अल्फाज़
जिन पर अब कोई मानी उगते नहीं हैं

जबां पर जायका आता था सफ़े पलटने का
अब ऊँगली क्लिक करने से बस एक झपकी गुज़रती है
बहुत कुछ तह-ब-तह खुलता जाता है परदे पर
क़िताबों से जो ज़ाती राब्ता था वो कट सा गया है

कभी सीने पर रख कर लेट जाते थे
कभी गोदी में लेते थे
कभी घुटनों को अपने रहल की सूरत बनाकर
नीम सजदे में पढ़ा करते थे
छूते थे जंबीं से

वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा आईंदा भी
मगर वो जो उन क़िताबों में मिला करते थे
सूखे फूल और महके हुए रुक्के
किताबें माँगने, गिरने, उठाने के बहाने जो रिश्ते बनते थे
अब उनका क्या होगा।

UNESCO ने इस दिन की स्थापना इस उद्देश्य के साथ की थी कि लोगों में पढ़ने की आदत बनी रहे, ख़ास तौर से इसलिए कि युवजनों के मध्य यह प्रथा और भी विकसित हो। मैं कितना भी असल क़िताबों का पक्षधर हूँ, कहीं मन खुश भी है कि ebooks और Kindle ने नयी पीढ़ी को पढ़ने की ओर खींचने का काम किया है। तो आईये, हम आज पढ़ने का उत्सव मनाएं, अध्ययन की कला को जीवंत बनाये रखें और सम्मानित करें उन लेखकीय योगदानों को जिन्होंने क़िताबों के ज़रिये मानवता के सामाजिक और सांस्कृतिक उत्थान का मार्ग प्रशस्त किया।

___________________________

Photo-credit: squ.edu.om

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9 Responses

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  1. Wonderful sir…..this article has touched my childhood today, when we used to crazy for comics like Nagraj, chotu aur Lambu, Drakula, Chacha Choudhary, and many more ..but m telling you I couldn’t developed interest in subjects don’t know the reasons.

    I rem very well, my father used to say that “Books are the best friend” if you’ll make them your friend they will take you to new place and new world everyday, unfortunately life is not so easy imes.

    I am sure that the day will come soon when we read your books, will be happy to purchase them from book depot.

    Shashikant Singh

    April 23, 2013 at 3:40 PM

    • Well said, Shashi. I too was really fond of all these comic-characters. And yes, your father was very right – books are indeed our best friends.
      Keep reading, keep growing.

      RRGwrites

      April 23, 2013 at 4:03 PM

  2. Rishi, superbly put! And I am glad my hindi reading got a work-out! Unfortunately I don’t see very many people take up reading now… and that’s sad! UNESCO may soon need to rename the day as “International get back your reading ways day!”

    Tanuj

    April 28, 2013 at 7:32 AM

    • Tanuj, well said, mate! If people keep ‘x-boxing’ and ‘TV-ing’ the same way, UNESCO may as well designate such a day as you recommend.

      RRGwrites

      April 28, 2013 at 9:44 AM

  3. I loved the title “Kitabiyat” and also the post. The school library card that you shared,’Tinkle’and ‘Amar Chitra Katha’ brought back some wonderful memories. Evertime I vist home, I try to pick some or the other book to gift my niece and nephew. The e-books and e-paper are helpful in making our lives a bit sorted but nothing can take away the charm of a book or a newspaper.
    Also, thanks for sharing Gulzar saab’s nazm…

    anuverma

    April 28, 2013 at 1:09 PM

    • अरे अनु! वो कहते हैं ना कि “लखनऊ की नज़ाकियत है कि रसगुल्ले भी छील कर खाये जाते हैं” – सो इसलिए क़िताबों की बात को अपने लखनवी अंदाज़ में ‘क़िताबियत’ कहते हैं!

      And I am glad you resonate with the love for reading; I am sure some of us will endure this liking for real books for our lifetimes, at least!

      RRGwrites

      April 28, 2013 at 2:21 PM

  4. Reblogged this on RRGwrites and commented:

    World Book Day or World Book and Copyright Day (also known as International Day of the Book or World Book Days) is a yearly event on 23 April, organised by the United Nations Educational, Scientific and Cultural Organization (UNESCO), to promote reading, publishing and copyright.

    RRGwrites

    April 23, 2015 at 12:57 PM

  5. Ha Ha deeply written.. it reminds our childhood days when we use to rent comics,like Chacha Choudhary,Tin Tin,Nagaraj and etc..We used to open a shop for summer vacations so that everyone reads in the summer vacations.People & Places & Competition Success Review were few.
    Thanks for recalling old golden days.Sir

    Venkat Raman

    April 24, 2016 at 11:11 PM


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