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Archive for April 2013

5 Things Great Employees Do After They Resign

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OK; so you have called it a day and have decided to move on from your current job. Just like most of us, you would also like to believe you are a ‘great employee’. All through your tenure, you were an employee held in good esteem by your organization. You had a considerably long association too. Now, you’ve just resigned and in some time you would be moving on to something new, maybe something better, something different. Great! Now, let’s serve the notice period…

In my experience of hiring thousands of people in my career, I have observed myriad, albeit strange developments in the operating patterns of both employees and employers, after the resignation is tendered and exit-formalities commence. Sometimes, these behaviours aren’t spot-on and befitting a ‘professional’.

Here are the 5 things that I think ‘truly great’ employees do after they have resigned and are serving the notice-period:

  1. A ‘Truly Great Employee’ would not speak ill of her organization, team or supervisor; she’d spread absolutely no negativity around.
  2. She won’t walk around notifying about her ‘resignation’ to all and sundry. She would discuss and allow the supervisor to plan a communication, as to ‘when, to who all and how’ and then stay true to the plan.
  3. She would not stop putting her total dedication and heart in her work, till the very last day and ensure a fair handover.
  4. She would not use the current offer to ‘bargain, just to ‘enjoy’, even when there isn’t any intention to stay. That’s just not done.
  5. She would say, ‘Thank You’ and mean it. And not just to the boss or immediate colleagues, but also to the stakeholders, to associates in other functions and the support staff. She would just not simply drop an email thank-you note while walking out, would rather walk up to all such fellow-workers and express her appreciation in person.

To my mind, that’s what ‘truly great employees’ do when they resign. And they do so even if their experience with the company and/or the manager wasn’t exactly enriching or rewarding, or even when their manager/organization starts treating them differently post resignation. They behave mature and stay committed till the last day of work and even thereafter. And by saying that, I do not mean in any way that feedback, even candid one, should not be given; in fact, one must give constructive feedback during the exit interview process. What I am stressing here is the personal conduct of the employee should remain dignified and graceful. An impactful statement I heard from a senior leader the other day, “Never let your good name be destroyed”; a great employee would stay true to these words, even in the parting days.

Have you similar or some other behaviours in people after they resign? How did you act when you tendered your last resignation? Do share…

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क़िताबियत…

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Readingआज ‘वर्ल्ड बुक डे’ है। अपने आप में अनूठा ये दिवस हर साल 23-अप्रैल को सौ से भी अधिक देशों में मनाया जाता है। UNESCO द्वारा स्थापित ये दिन पुस्तकों, लेखकों, प्रकाशकों और कॉपीराइट का प्रतीकात्मक माना जाता है। कुछ ऐसा मान लीजिए कि ये क़िताबों का, पढ़ने का, पाठन-पठन, अध्ययन का उत्सव है।

मैं क़िताबों का बड़ा शौक़ीन हूँ, बचपन से ही। अमूनन छोटे बच्चे वो सब जल्द सीख जाते हैं जो वो अपने वाल्दैन को करते देखते हैं। हमने यह आदत अपनी माँ से पाई, जो जैसे ही बाबा सुबह काम को जाते और घर का काम ख़त्म होता, कोई न कोई क़िताब, पत्रिका, समाचार-पत्र, इत्यादि पढ़ती मिलतीं। रोज़ दिन के वक्त जब मैं स्कूल से वापस आता तो ये नज़ारा सामने पाता। मालूम होता है कि उस समय मेरे बाल-मन को ये दृश्य भा गया होगा; फिर तो जो ‘क़िताबियत’ की लत लगी, वो आज तक जारी है।

मुझे याद आता है कि आठ-नौ साल का होते-होते मैंने बहुत सारी किताबें पढ़ ली थीं। न सिर्फ़ किताबें, पर बहुत सारी कॉमिक्स और पत्रिकाएँ भी। तो जो थोड़ा बहुत विज्ञान, सामान्य-ज्ञान और दुनिया-भर के देशों की रैय्यत-रवायत के बारे में जानकारी आज मुझे है या और जानने की उत्सुकता कभी हुई, उसका इल्ज़ाम स्कूल की क़िताबों पर नहीं, ‘अमर चित्रकथा’ और ‘टिंकल’ के अनेकानेक अंकों पर है। इसी तरह से जो देश-दुनिया की राजनीति के बारे में पढ़ने का कीड़ा लगा, वो किसी और वजह से नहीं पर उस ज़माने की पत्रिका ‘माया’ से लगा; और मैं कह सकता हूँ कि इस विलुप्त हो चुकी पत्रिका का मुकाबला कोई समकालीन राजनितिक पत्रिका नहीं कर सकती।

बचपन में क़िताबें पढ़ने का कुछ फ़ितूर सा था। वैसे तो हम घर पर होते नहीं थे – खेल-कूद ज़िन्दाबाद, पर जब होते तो कोई-न-कोई क़िताब हर वक्त हाथ में होती थी। रिश्तेदारी में आना-जाना होता तो भी वहां कुछ पढ़ने के लिए ढूँढ कर हम एक कोना पकड़ लेते, और कई बार याद है कि डांट खाई कि अब खाना खाते समय तो क़िताब से नज़रें हटा लो; पर हम भी एक अलग ही ढीठ थे भाई, मज़ाल है कि मान जायें। उस ज़माने में एक नयी बला भी आयी थी – विडियो-गेम्स। सारे चचेरे-ममेरे भाई-बहन उसी पर लगे रहते, पर हमें तो कुछ मज़ा नहीं आया ‘मारियो’ खेलने में कभी; हम तो बस जब भी चारदीवारी के भीतर होते, तो कुछ-न-कुछ पढ़ते ही पाए जाते.

एक और किस्सा इसी क़िताबियत का ज़हन में है – लखनऊ का बाल-संग्रहालय और उसकी लाइब्रेरी। उत्तर प्रदेश के शायद आखिरी सभ्य और जनपालक मुख्यमंत्री, स्व. चन्द्र भानु गुप्ता जी, ने अपने विशाल सम्पति दान दे कर ऐसी भलमनसाहत से प्रेरित कई संस्थाएं बनायीं थी, जो आज भी चल रही हैं और उन अरबों रुपयों से बने ‘माया-स्मारकों’ से कहीं ज्यादा समाज का भला और ‘परिवर्तन’ कर रहीं हैं। खैर, मैं विषय से भटक रहा हूँ, बात तो क़िताबों की हो रही थी ना। आठ साल की उम्र में माताजी ने हमारी किताबें ख़रीदने के चस्के पर लगाम लगाते हुए हमें इस पुस्तकालय का रास्ता दिखाया, जो कि आना-जाना मिला के पूरे 6-किलोमीटर लंबा था। और इस ग़लतफ़हमी के बिना कि आज के ‘साहबज़ादों’ की तरह कोई लेने-छोड़ने जायेगा, हमें माँ ने कुल दस पैसे का सदस्यता-फॉर्म और सिर्फ दो-रुपयों की ‘कॉशन-मनी’ (जी हाँ, आपने ठीक पढ़ा; अमां मियाँ, तब सस्ते का ज़माना था!) दे कर लाइब्रेरी का मेम्बर बनवा दिया। अब हम जा पहुँचे एक ऐसी दुनिया में जहाँ एक विशालकाए लाइब्रेरी की बरबस मदहोश कर देने वाली महक थी। अब भाई, पुस्तकों की दुनिया कुछ ऐसी ही लगती थी हमें। याद पड़ता है कि दो-तीन महीनों की 1988 की गर्मियों की छुट्टियों में हमने कितनी ही किताबें घोट डालीं – भारतीय और विश्व साहित्य दोनों। अपने राम रोज़ सुबह 9:30 बजे घर से निकलते, पैदल चलते हुए ठीक दस बजे लाइब्रेरी के दरवाज़े पर। और फिर सीधे पांच बजने पर बाहर आना होता। ये कवायद पूरी गर्मी चलती, और बस जिन दिनों क्रिकेट-मैच खेलने के चक्कर में हम ना जा पाते, उन दिनों के लिए एक-दो क़िताबें घर ले आते। ये सिलसिला 1990 तक चला, तब तक हम दस साल के हो गए थे और एक दिन हमें ‘बाल-संग्रहालय’ से बाहर कर दिया गया, यह कह कर कि अब हम ‘बाल’ नहीं रहे! क्या बताएं आपको साहब कि कितना गुस्सा आया; मन हुआ कि पूँछें कि किस नामुराद ने यह तय किया था। पर कुछ लाइब्रेरियन का डर और उससे ज्यादा माँ-बाबा की इज्ज़त के लखनवी लिहाज़ ने मुंह सिल दिया और हम मन-मसोस के रह गए। बड़े दिनों तक इस लाइब्रेरी से बिछड़ने का रंज रहा; आज के ज़माने में शायद ‘ब्रेकअप’ होने पर कुछ ऐसा ही महसूस होता होगा।

Cathedral Library Card

क़िताबों से इश्क कुछ यूं ही परवान चढ़ता रहा; और बहुत से पुस्तकालय जीवन में आये और उनसे बहुत कुछ सीखा और पाया। लखनऊ के कैथेड्रल स्कूल का ‘लाइब्रेरी पीरियड’, जिसके दौरान निराला, नागर और बच्चन से परिचय हुआ और जहाँ लाइब्रेरियन-मैडम सिंह ने अंग्रेजी साहित्य से दोस्ती करवाई। या फिर Symbiosis Law College की लाइब्रेरी, जहाँ दिन के आठ-आठ घंटे बैठ हमने क़ानून से दोस्ती की। उसके और भी फायदे हुए; एक दिन प्रिंसिपल साहब, डा. रास्ते, ने हमे क़ानूनी क़िताबों से पेंच लड़ाते देखा, ना-मालूम कैसे उन्हें हमारे ज़हीन होने का शक़ हुआ और फिर हमें प्रतिष्ठित ‘Symbiosis Law Journal’ का संपादक चुन लिया गया। इस बड़ी ज़िम्मेदारी को निभाते हुए हमने महान वकील ‘नानी पालकीवाला’ के ऊपर एक संस्करण छापा, जो आज भी देश-भर की क़ानून-सम्बंधित पुस्तकालयों में रखा देखा जा सकता है। ये सम्मान भी हमारी क़िताबियत के शौक़ में मिला। एक और बात इस समय की मुझे याद आती है कि वहां की लाइब्रेरियन-मैडम, जो ऊपर से बड़ी ही सख्त-मिजाज़ थीं और जिनसे सब डरते थे, मुझसे एक अबोला स्नेह रखतीं थीं और जब मैं कॉलेज छोड़ कर दिल्ली आ रहा था तो सिर्फ वो थीं वो कुछ दुखी मालूम हुईं थीं।

दिल्ली विश्वविद्यालय आने पर मालूम हुआ कि दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स की रतन टाटा लाइब्रेरी का तो क्या ही कहना, मानो क़िताबों का अथाह समंदर। ऊपर से लॉ-फैकल्टी के पुस्तकालय जाने का जुगाड़ भी हमने ढूँढ लिया था। VKRV छात्रावास में भी प्रो. मित्रा के मार्ग-दर्शन में एक बेहतरीन लाइब्रेरी बनाई गयी थी, जो ज़्यादातर उन छात्रों की दान की हुयी पुस्तकों से बनी थी जो पढ़ाई पूरी कर के ‘कॉर्पोरेट-जगत’ में अपना भविष्य बनाने निकलते थे। इन तीनो जगाहतों के सायों में हमारी क़िताबों से मित्रता चलती रही।

नौकरी में आने के बाद भी यह इश्क़ कम नहीं हुआ; पहले बॉस ने बहुत ही सख्ती से समझा दिया कि मैनेजमेंट में अच्छा करना है तो अपनी जानकारी दुरुस्त रखो। अब हम तो जी खुश हो गए; ‘अँधा क्या चाहे, दो आँखें’ वाली मिसाल मानों सच हो रही हो। सो पढ़ना बदस्तूर जारी रहा और बॉस से भी बिना चापलूसी की ज़हमत उठाये दोस्ती सी हो गयी और फिर उसके बाद बहुत कुछ सीखने को मिला।

सालों बाद जब जीवन-संगिनी से मुलाक़ात हुयी तो मालूम हुआ कि उनकी ज़हीनियत का राज़ भी उनकी क़िताबों से दोस्ती है जो उन्होंने अपने वाल्दैन से विरसे में पायी थी। फिर क्या था, दो क़िताबी शौक़ीनों साथ आने पर और भी कई नयी पुस्तकों से दोस्ती हुयी, और पिछले 6 सालों में अनगिनत क़िताबें पढ़ डाली गयीं। कुछ समय पहले बीवी ने इस शौक को लिखने तक बढ़ाने का मशवरा दिया, जो इस blog की सूरत में तामीर है।

क़िताबों का प्रेम भी अनूठा है। मशहूर इसरायली लेख़क, अमोस ओज ने अपनी आत्मकथा – ‘अ टेल ऑफ़ लव एंड डार्कनेस’– में लिखा है:

“…जब मैं छोटा था, तो मेरा सपना था, बड़ा होकर मैं एक क़िताब बनूँगा। लोगों को चींटियों की तरह मारा जा सकता है। लेखकों को मारना भी कोई मुश्किल काम नहीं, लेकिन क़िताबों को नहीं। आप कितना भी योजनाबद्ध तरीके से किसी क़िताब को ख़त्म कर लेने की कोशिश करें, एक संभावना हमेशा बनी रहेगी कि उसकी कोई एक प्रति दुनिया की किसी न किसी लाइब्रेरी के एक कोने में जिंदा बची हुई है।”

अब ज़माना बदल रहा है और उसके साथ पढ़ने की कला भी। पिछले कुछ सालों में लोगों को नयी तरह से किताबें पढ़ते देखता हूँ – ebooks! कितने तरह के तकनीकी उत्पाद आ गए हैं; Kindle, Google Nexus, iPad ने मानो क़िताबों को एक नया स्वरुप दे दिया है। दुनिया भाग रही है, तो क़िताबें पढ़ने का तरीक़ा भी बदलता जा रहा है। और फिर कहाँ है आज-कल के सिमटते घरों में क़िताबों की अलमारियां लगाने की जगह? और फिर ये क़िताबें सहेजने की ज़हमत उठाने की ज़रूरत क्या जब एक Kindle हज़ारों-हज़ार पुस्तकें अपने छोटे से आकार में समेट लेता है…और ये भी देखता हूँ कि ebook-reader बनाने वाली बड़ी-बड़ी कंपनियों ने अपने उत्पादों को असल क़िताब की शक्ल-सूरत देने की कोशिश की है, शायद मेरे जैसे कुछ बीसवीं सदी के क़िताबी-कीड़ों के मद्देनज़र…

आज मेरे एक हाथ में एक क़िताब है जो मैं एक बड़ी-सी क़िताबों की दुकान से खोज कर लाया हूँ, और दूसरे हाथ में एक iPad, जिसमें कई क़िताबें समायी हुईं हैं। मन बारहां असल क़िताब की तरफ़ भागता है; उसके पन्नों में मेरे बचपन की महक है, उन पुस्तकालयों की यादें हैं जहाँ मैंने अपने सैकड़ों दिन बिताये, उन दिनों की याद है जब पैसे जोड़ कर मैं क़िताबें खरीदता था और सहेज कर रखने का जतन करता था। इस बेगानी सी ebook में वो बात कहाँ…

गुलज़ार साहब की एक नज़्म आज पढ़ी, जिसका शीर्षक है – ‘क़िताबें झांकती हैं’। शायद यह पंक्तियाँ उन्होंने किसी ऐसे ही मौके पर लिखी है –

क़िताबें झांकती हैं बंद अलमारी की शीशों से
बड़ी हसरत से तकती हैं
महीनों अब मुलाकात नहीं होती
जो शामें उनकी सोहबत में कटा करती थीं
अब अक्सर गुज़र जाती हैं कंप्यूटर के परदे पर

बड़ी बेचैन रहती हैं क़िताबें
उन्हें अब नींद में चलने की आदत हो गयी है
जो ग़ज़लें वो सुनातीं थीं कि जिनके शल कभी गिरते नहीं थे
जो रिश्ते वो सुनातीं थीं वो सारे उधड़े-उधड़े से हैं

कोई सफ़ा पलटता हूँ तो इक सिसकी निकलती है
कई लफ़्ज़ों के मानी गिर पड़े हैं
बिना पत्तों के सूखे ठूंट लगते हैं वो सब अल्फाज़
जिन पर अब कोई मानी उगते नहीं हैं

जबां पर जायका आता था सफ़े पलटने का
अब ऊँगली क्लिक करने से बस एक झपकी गुज़रती है
बहुत कुछ तह-ब-तह खुलता जाता है परदे पर
क़िताबों से जो ज़ाती राब्ता था वो कट सा गया है

कभी सीने पर रख कर लेट जाते थे
कभी गोदी में लेते थे
कभी घुटनों को अपने रहल की सूरत बनाकर
नीम सजदे में पढ़ा करते थे
छूते थे जंबीं से

वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा आईंदा भी
मगर वो जो उन क़िताबों में मिला करते थे
सूखे फूल और महके हुए रुक्के
किताबें माँगने, गिरने, उठाने के बहाने जो रिश्ते बनते थे
अब उनका क्या होगा।

UNESCO ने इस दिन की स्थापना इस उद्देश्य के साथ की थी कि लोगों में पढ़ने की आदत बनी रहे, ख़ास तौर से इसलिए कि युवजनों के मध्य यह प्रथा और भी विकसित हो। मैं कितना भी असल क़िताबों का पक्षधर हूँ, कहीं मन खुश भी है कि ebooks और Kindle ने नयी पीढ़ी को पढ़ने की ओर खींचने का काम किया है। तो आईये, हम आज पढ़ने का उत्सव मनाएं, अध्ययन की कला को जीवंत बनाये रखें और सम्मानित करें उन लेखकीय योगदानों को जिन्होंने क़िताबों के ज़रिये मानवता के सामाजिक और सांस्कृतिक उत्थान का मार्ग प्रशस्त किया।

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Photo-credit: squ.edu.om

Leadership is NOT only about the Leader

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leadersquotesLeadership is not ‘only about self’; you know that feeling of ‘I am the most important and senior of all’. Most of the leaders fail to understand this, and thus, fail at leadership altogether. If a leader does not appreciate the concept of moving over ‘self’ and strive to be with others and serve them rather than being self-indulgent, her followers or subordinates will not entrust her with their trust and confidence. I have said in my earlier blogs – a leader is of no use if her followers do not ‘genuinely‘ wish to be led by her.  Arrogant behaviour, intimidating demeanour and ego are not leadership characteristics. And absence of authenticity will take away the shine off the choicest of pleasant words and flowery language.

Real leaders are ‘real’ people. Fake behaviours will only earn them fake followers…

What do you think?

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Photo-credit: searchquotes.com

TATA Log

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TatalogI wish to share with you all a superb book that I just started reading – ‘Tatalog. Today, I completed the first two chapters and am impressed! Written by Harish Bhat, MD of Tata Global Beverages Ltd, and published by Penguin, this is a collection of “hitherto untold…eight modern stories from a timeless institution.”

For readers who don’t know ‘Hindi’ language, ‘log’ is a hindi word for ‘People’. I got drawn towards reading this book only because the foreword was penned by one of my all-time favourite authors, R Gopalakrishnan. You would recall Gopalakrishnan through his bestseller books – ‘The Case of The Bonsai Manager’ and ‘When The Penny Drops’. However, now that I have read the first 50 pages and learnt about the untold story of the ‘Tata Indica’, written so aptly by a Tata insider, I am so looking forward to reading further… about Tanishq, Tata Finance, Tetley, EKA, about ‘second careers of intelligent women’ and Tata Steel.

I will surely come back with a detailed book-review in few weeks’ time for you. Till then, I am leaving you with what Gurcharan Das opined about the book; do note the power of the last phrase:

“This is not a hagiography. In the tradition of the best business books, it teaches something about the way the world works. It explains why the Tatas have endured for 150 years: not because they did not make mistakes, but their errors were portals of discovery.”

 So apt, isn’t it?

I would recommend this to all who follow writings on organization & change and who wish to learn from the massive human effort called ‘TATA’.

People Observe Leaders All The Time…

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ObservationA chance encounter over my last blog introduced me to a young employee at my workplace today; she was following my blog and knew me, though we had never interacted earlier. During a very brief conversation that we had today, I realized a very powerful thing – people observe leaders all the time! She shared her observations and mentioned an incident where she noted one of my traits, which helped her form a view about me.

That conversation left me thinking; in large size organizations of modern times, people observe us all the time. And they do so even more specifically in case you’re holding a leadership position. I was forced to ponder – I manage human resources for over five thousand people and if in all these years I met each of them just once, that one happenstance would have defined their memory, their reflections. It doesn’t matter whether that encounter was good, bad or just plain simple indifference; their opinion is made, probably forever.

That made me wonder about many more who just observe us from a distance; people with whom we never even interacted, they too form an observation. They do so by simply following what you say to others, how you say it, and sometimes, by the way you treat your people. All of these pass a message to these observers, what you are, how you operate, what works with you & what doesn’t, et al. Moreover, each of these messages from a leader carries a distinct weight because of the authority of the position behind it. Now, that’s something, isn’t it? Think of it, if relationships are the key to build sustainable businesses and chart the growth of self and organization, these observations go a long way in establishing your credibility and acceptance as a leader. Your mood swings, your positivity and negativity, your smiles and frowns, your warm handshakes and shining eyes, your rude demeanor and a curt nod – people would remember those actions and conversations, which you may yourself forget. And basis these memories, some of these people will write your legacy one day…

Let me share an example. I travel to a lot of stores, located across over hundred cities of India. I walk the aisles, talk to customers, meet and greet some associates. I mostly speak with them individually and sometime address them as a group, albeit never for over 2-3 minutes and certainly couldn’t get to speak with each & every associate working in these stores, yet, I notice everyone working on the floor observes their HR leader so keenly. I am sure even those minutest, tiniest conversations, behaviours and actions get noted and remembered by most of these associates. And since I don’t get to visit the same location for more than twice a year and certainly never during the same shift-hours, there is a great possibility that the associates I meet won’t see me again for good six-to-twelve months and hence, those memories for the last encounter become their final ones! I am sure, this example would be true for many of you, of course in different settings.

Now, I am not advocating we take every step keeping in view what others would think or opine; that would be too difficult for a leader. Yet, it is indeed important for all leaders to consider themselves as a ‘message‘ – every time you say something, behave in a particular manner or even use a specific word, ask yourself, does that convey your values, your thought-process and what you wish others to note and follow? Or do you end up conveying something else? I am sure that’d help you send the right ‘message‘ every time.

My learning of the day is a big one – there are ‘no casual actions, no casual conversations’. Your words and actions carry a lot of weight, especially when you carry the baton of being a leader. The remarks you made while walking the hallway, jokes you shared in the cafeteria, words written in emails/text messages and social media, even which of the posters made you stop & read the noticeboard – all these actions and gestures are ‘messages’ and ‘vital forms of communication’ and while you are at it, people are making their notes.

Did I make you think? If yes, just think of it, what ‘messages’ did you give out today?

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Photo-credit: wemovetogether.me

हमारे विचार…

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आज मैं आपसे शहीद भगत सिंह का उनके अंतिम समय का एक कथन बाँटना चाहता हूँ; ना जाने क्यों आज मुझे यह बहुत याद आ रहा है –

“ऊषा काल के दीपक की लौ की भांति बुझा चाहता हूँ। इससे क्या हानि है जो ये मुट्ठी भर राख विनष्ट की जाती है। मेरे विचार विद्युत की भांति आलोकित होते रहेंगे…”

 

कितना गंभीर और निश्छल, परन्तु सत्य वचन है; और इतिहास इस बात का साक्षी है कि उनके विचार आज भी हमें आलोकित करते है…

आईये, आज सोचें कि क्या हमारे आचरण में, विचारों में इतना तेज है कि वो हमारे जाने के बाद भी याद किये जायेंगे और लोग उनका अनुसरण करेंगे?

Written by RRGwrites

April 5, 2013 at 6:21 PM

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