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शुरुआत तो करो, बदलेगा इंडिया…

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अभी कुछ देर पहले NDTV इंडिया पर टीवी एंकर शारिक की एक बेहद सरल, पर सशक्त प्रस्तुति देखी। मन को छू गयी, इसलिए आपसे बाँट रहा हूँ।

पिछले कुछ दिनों में हमने देखा किस तरह से कमल हासन की आगामी फिल्म ‘विश्वरूपम’ का विरोध हुआ; तमिलनाडु सरकार ने रोक भी लगाई, जिसे उच्च-न्यायालय ने पहले तो हटाया और फिर रोक लगा दी। चूँकि अब इस तरह की बेवजह रोक-टोक आम होती जा रही है, मन दुखी ज़रूर हुआ, पर इस पर कुछ लिखूँ, इतनी न इच्छा हुयी, न उसका फायदा लगा।

पर आज बड़े दिनों के बाद इस पत्रकारिता की राह से भटकते हुए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में कुछ ऐसा देखा, जो लगा की वास्तव में जन-जागरण के मानस का परिचायक है।

शारिक आज हमें दिल्ली के चाँदनी-चौक की गलियों में ले गए, ये देखने सुनने कि हमारे मुसलमान भाई इस विषय में क्या सोचते हैं। बहुतों से दरयाफ्त किया; मालूम हुआ कि  या तो आम मुसलमान जानता ही नहीं कि ये ‘विश्वरूपम’ क्या बला है, या फिर बिलकुल साफ़ सोचता है इस बारे में। जवां और बुजुर्ग दोनों दिखे शामिल इस बात को पुरज़ोर कहने में कि “अरे, पहले देखने तो दो भाई! फिर ही तो कह सकते हैं कि क्या कुछ है भी इसमें ऐसा जो हमारे या फिर इस्लाम के ख़िलाफ़ है।” कोई एक भी ऐसा नहीं मिला जो कहता की यह बेवजह की सियासतदानी नहीं है। कुछ ऐसे भी थे जो बोले कि “अमां मियाँ, देखने दो फिल्म, अगर लगा की शिकायत है कोई तो आवाम विरोध करेगा खुद, कुछ लोग कैसे अपने-आप तय करेंगे कि हमारे लिए क्या सही है…आखिर जमहूरियत है देश में!”

मैं अवध का रहने वाला, गंगा-जमुनी तहजीब का अमली-जामा पहनने वाला खालिस लखनवी ये बातें सुन के बेहद खुश हुआ। लगा कि अभी भी उम्मीद बाकी है कुछ इस वतन में।

और भी सुकून हुआ जब चलते-चलते, प्रोग्राम के अंत में एक बेहद जहीन युवक ने बड़ी ही तमीज़ से यूं फ़रमाया, …इस्लाम एक मुकम्मल धर्म है…मेरे मज़हब पर मेरा यकीन पूरा है, इसे किसी के दो बातें कह देने से कोई फर्क नहीं पड़ता…”
 
सुन के लगा, कितनी ही सरलता से इस नौजवान ने इतनी गहरी बात कह दी। आपसे इस उम्मीद से बाँट रहा हूँ कि आप इस बारें में सोचेंगे; और इस उम्मीद से कि सही ही होगा जो चर्चित फ़िल्मकार और लेखक प्रसून जोशी ने NDTV इंडिया के लिए लिखा, “शुरुआत तो करो, बदलेगा इंडिया…”
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Written by RRGwrites

January 31, 2013 at 8:55 PM

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